गौरैया का भोज्य है, काकुन कीड़ा धान
झुरमुट से स्नेह है, माँगे नहीं मकान
माँगे नहीं मकान, ज़रूरत है तिनका भर
मत दुत्कारो उसे, फुदकने दो अपने घर
जिज्ञासा मनुहार, बुलातीं निज अँगनैया
आजा ओ लाडली, दुलारी प्रिय गौरैया॥
मेरे रोशनदान में, गौरैया का वास
लोकतंत्र से माँगती, जंगल में आवास
जंगल में आवास, हरी हो तरु की डाली
एक बनाऊँ नीड़, कँगूरे हों, हो जाली
चूँचूँ कर गुलज़ार, करें घर चूजे घेरे
विनय निवेदन आस, तुम्हीं से मानव मेरे॥
जिज्ञासा सिंह
आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में रविवार 22 मार्च 2025 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
जवाब देंहटाएं👏👏
हटाएंआपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में रविवार 23 मार्च 2025 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
जवाब देंहटाएंबहुत बहुत आभार आदरणीय दिग्विजय अग्रवाल जी!
हटाएंसुंदर
जवाब देंहटाएंब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है, विनम्र आभार!
हटाएंबहुत सुंदर अभिव्यक्ति
जवाब देंहटाएंसादर आभार आपका भारती जी।
जवाब देंहटाएंगौरैया पर अति सुंदर रचना
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