घर की मुंडेरी पे बैठी
बीड़ी पीतीं अम्मा ।
खट-खट खट-खट खाँसें बापू
हुआ ज़ोर का दमा ॥
अस्पताल है कई
बरस से बना हुआ ।
अंग्रेजी डॉक्टर है
बैठा तना हुआ ॥
गाँव गिराँव एक
पाँव से दौड़ पड़ा है ।
बीमारी को दूर
भगाने डटा खड़ा है ॥
गमछा बाँधे, घूँघट काढ़े
भीड़ हो गई जमा ।
दीवारों में जड़े हुए हैं
नंबर हेल्पलाइन ।
लंबरदार दुआरे बैठी
अरखिन औ घसिटाइन ॥
सोंटा लिए टेकते आईं,
दोनों बुढ़िया बेवा ।
मिले बुढ़ापा, विधवा पेंशन,
खाएँ वे भी मेवा ॥
कोई पालनहार नहीं,
न कोई रहा कमा ॥
नैतिक पाठ पढ़ाने वाले
बीड़ी भी दे जाते ।
निथरी खटिया लेटे बापू
तनिक नहीं खिसियाते ॥
मक्खी भिनक रही
थाली बच्चों के हाथ ।
मिला मिला के खाते
भात चटनी साथ ॥
अहा ! निकलता स्वाद
भोज मन रमा ॥
**जिज्ञासा सिंह**