देख शशि धवल मनोहर है
किरन पे बैठ रहीं परियाँ
बाँह फैलाए अंबर है
बैठ दरिया के तट पर मैं
किरन एक ढूँढ रही तल में
अनोखी छवि सुंदर चंचल
मचाए हलचल है जल में
वो बैठा दूर गगन में भी
बुलाता मुझको सस्वर है।।
अरे कोई बाँह पकड़ मेरी
चलाचल किरणों के जग में
बिछे हैं सुमन सितारों के
सुगंधित धूप भरे रग में
पवन संग उड़ते जाते पग
दिख रहा सपनों का घर है
झरे कुमकुम रोली अच्छत
अलक श्रृंगार करे है यूँ
बुलावा भेजा जब शशि ने
भला फिर जाऊँ न मैं क्यूँ
क्षितिज के पास मिलन होगा
साक्षी संध्या, दिनकर है ।।
एक शशि भूषण है नभ का
एक मेरे दृग में रहता
मलय बन शीश मेरे शोभित
है हर क्षण अंग अंग बहता
कलित, रमणीक, रम्य, सुंदर
सुशोभित जो मेरे उर है ।।
आज शशि धवल मनोहर है ।।
**जिज्ञासा सिंह**