हर कण कण में, हर इक क्षण में,
द्रुम द्रख्तों का दिखे अवतरण ।
घर्षण की चिंगारी से,
निकले नव अंकुरित किरण ।।
वो अनुरागिनि बैठ धरा पर
शत शत दीप जलाय रही ।
बीज कुबीज लिए आँचल में
मरु सी भूमि सजाय रही ।।
बारंबार गिरे धरणी पर
सह डाले अगणित अंधड़ ।।
सागर की कल कल छल छल
के आगे भीख माँगती है वो ।
दे दो हे रत्नाकर बूँदें
देती तुमको है बरखा जो ।।
आँख मूँद कर, अपने हाथों
करती बस धरती का पोषण ।।
आएगी इक दिन तो हरितिमा
पहने पातों की चुनरी ।
लाखों व्यवधानों से लड़कर
रक्खी झोली सदा भरी ।
बाधाओं से हर पग में वो
जीत रही है निशदिन रण ।।
चीर वक्ष काली रैना का
अरुणोदय प्राची रसरंग ।
धरनी का श्रृंगार किया
ले इंद्रधनुष के सातों रंग ।।
ये आशा है, जिज्ञासा है
ये उसके जीवन का प्रण।।
**जिज्ञासा सिंह**