मेरे ह्रदय पर शूल उगे
मेरे हृदय पर फूल उगे
शूलों से गूंथा पुष्प और
वेणी में अपने लिए लगा
घातक पशुओं से घिरी हुई
अपने मृग से भी डरी हुई
मैं मकड़जाल में फंसी मगर
चुन चुन कोमल पल्लव ही चुगा
घनघोर घटाओं में घिरकर
बिन पंख हुए माखी मधुकर
मैं भी भटकी कानन कुंजन
फिर भी न मेरा विश्वास डिगा
अमृत से मेरा कंठ भरा
यह देख लगा मुझपे पहरा
बन गए शिकारी सब मेरे
सौ बार तीर सीने में लगा
जब दावानल ने मुँह फाड़ा
लौ बीच फँसा मेरा बाड़ा
मैं क्षितिज तलक भागी दौड़ी
अपने पुंजों को हृदय लगा
मैं कोटि सघन वन की मिरगा...
**जिज्ञासा सिंह**
चित्र साभार गूगल
