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मन का दिया

दिया जैसे जलाया,रोशनी ब्रम्हांड में फैली
हुआ ऐसा उजाला छुप गई दुनिया मेरी मैली

दिए का मोल करने लग गईं अनमोल आँखें
गगन में उड़ चलें लाखों पतंगे खोल पाँखें

ये मिट्टी से बना दीपक है या है धातु निर्मित
अलौकिक ज्योति इसकी कर रही है विश्व जागृत

मुझे भी चाहिए आलोक देता दीप ऐसा 
जलाकर खुद की काया दीप्ति देता जो हमेशा

दिए ने दे दिया उपहार उज्ज्वल हर दिशा को
खोलना चक्षु खुद ही पड़ गया गहरी निशा को 

मैं हाथों में दिया थामे चली किस ओर न जानूँ  
भरी जाती हृदय में कांति कैसी ये भी पहचानूँ 

खुला जो मार्ग दिखता उस तरफ मैं चल पड़ी आगे
बढ़े जब कदम दृढ़ता से,अँधेरा पीछे है भागे

दिया आलोक फैलाए, है छाई चाँदनी जगमग
करें मिल के उजाला हम, तो जागृत होगा सारा जग

**जिज्ञासा सिंह**

वृद्ध हूँ मैं

                                                                 

   

चित्र-साभार गूगल 

                                  ब्रम्हाण्ड में, मैं कहाँ हूँ

भटकता हुआ अक्सर सोचता रहा हूँ

शायद बवंडर में घूमता एक तिनका हूँ


या उंजाले की तलाश करता

एक जलता बुझता दिया हूँ


या पगडंडी पर कटे हुए पेड़ का 

पड़ा हुआ सूखा तना हूँ 


या लू के थपेड़ों में जूझती 

साँय साँय करती ग़र्म हवा हूँ


या बहने को तरसता,

सूखा पड़ा एक दरिया हूँ


या फिर अपनों की भीड़ में कोना ढूँढता 

जीवन जी चुका एक वृद्ध इंसां हूँ


  **जिज्ञासा सिंह**