असमय समय मार गया
कोड़े लगा लगा, धिक्कार गया
अनजानी हवा का झोंका
सर्प की फूँक सा फुफकार गया ।।
स्तब्ध अटल गड़ गया पाँव
नीचे जमी भी नहीं रही
ज्वालामुखी फटने के बाद
लौ धधकती रही
जला लावा उड़ उड़ चेहरे की
रंगत बिगार गया ।।
वो चमक वो आभा कभी
जो मृगनयनी आँखों ने देखा
सजी संवरी बनी रही
वो कामिनी सुरेखा
पहिया चला समय का, बिन मंजिल
चौराहे पर उतार गया ।।
समय पर समय ही बतायेगा
कि समय ऐसा भी होता है
तुम समय को या समय तुमको
कोई न कोई तो एक दूजे को ढोता है
समय का पड़ा गहरा घाव
रिस बार बार गया ।।
**जिज्ञासा सिंह**