हे मन मेरे ध्यान धरो
विचरण मन जब करे सघन वन
पात खोजता है वो निर्मल
क्षीण दिख रही है बगिया की
नई अंकुरित कोमल कोपल
फिर भी कलिका खिली हुई जो
उसका ही कुछ मान करो
एक दिशा और एक दशा में
चलते जाते कई अनावृत्त
रेखाओं का जाल सजाया
मूक हो गई पर आकृत
कितनी बार कहा है चुप हो
रेखाओं में रंग भरो
साध्य और साधन का लेखा
भूल भी जाओ आज जरा रे
विजय वहाँ की नियति में होगी
सौ सौ बार जहाँ हारे
ऐसी निजताओं के भूखे
बनो और सम्मान करो
वही जोगिनी यात्रा होगी
जिस पर चलते लाखों पग
अधम अगम सब योग्य दिखेगा
तृष्णा बन जब उड़े विहग
अरे उठो तुम तनिक जमी से
खुद को थोड़ा दान करो
अनदेखी अनचाही यात्रा
लगती बड़ी कठिन दुर्गम
विचलन मन का हो या तन का
मैं हूँ, मैं ही हूँ बस मम ।।
है मंतव्य घिरा मानुष मन
दूर जरा अभिमान करो
**जिज्ञासा सिंह**
चित्र साभार गूगल