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शहीद की पत्नी का विलाप


उस मृगनयनी का विलाप सुनो

जो कल ही ब्याह के आयी थी
उसके क्रंदन का प्रलाप सुनो

इस रुदन की पीड़ा से हृदय 
जाता है थर थर कांप सुनो

है चीख पुकार सी मची हुई
घनघोर हुआ आलाप सुनो 

मेहंदी औ महावर धो डाला
छूटी न लालरी छाप सुनो

घर, देहरी औ दरवाजे पर
सन्नाटा और संताप सुनो

तोरण की लड़ियां टूट गई
मैहर की धूमिल थाप सुनो

पायल के घुँघरू बिखर गए
आती न कोई पदचाप सुनो

प्रभु के आगे सिर पटक पटक
दे रही दुहाई जाप सुनो

हे ईश्वर ! मेरे किन कर्मों का
ऐसा दिया है शाप सुनो

ये जीवन की शुरुआत ही थी 
फिर मुझसे हुआ क्या पाप सुनो ?
          
  **जिज्ञासा सिंह**