लइया है,चूड़ा है,चना है,
अभी अभी भूना है
गरमा गरम है
ऊपर से करारा अंदर से नरम है
जौ चने का सत्तू है ।
आवाज़ लगाता,गली में बेचता हुआ जा रहा पुत्तू है ।।
उसकी मधुर आवाज
आज
कई दिनों बाद सुनी
रागिनी
सी बज गई
अपने मन ही मन मैं खुश हुई
दौड़कर उसे देखा
भुने चने का स्वाद चखा
अनजाने अंदेशे से डरी हुई मैं
अंदर तक सिहरी हुई मैं
कुछ देर ठहर गई
आंखें भी भर गई
आज के दौर को सोचकर
कि कल अगर
बूढ़ा जर्जर पुत्तू
सुबह शाम बेंचता हुआ सत्तू
इधर से नही गुजरा
भगवान को हो गया प्यारा
तो फिर ये आवाज़ कभी नहीं आएगी
ये गलियां कितनी वीरान हो जाएंगी
सिसक उठेंगी हवाएं
ये फिजाएं
जिनमें वर्षो से गूंजती है,एक सुरीली सरगम
लइया है,चूड़ा है,चना है गरम गरम ।।
**जिज्ञासा सिंह**