दुल्हन जैसी सजी
फागुनी आई मेरे द्वारे
पहन बसंती चुनर,
माँग में टेसू रंग सजा रे ।।
क्षण क्षण मे वह रूप बदलती
कजरारी रतनारी
बदली जैसे केश उड़ाती
आज समीरा हारी
झाँझर की धुन सुन
धरती ने अपने अंक पसारे ।।
बौराया है बाग देख कर
मनुहारी ये छवियाँ
चटक चिहुक कर खिल खिल जाएँ
ले अंगड़ाई कलियाँ
भौंरा गाए गीत मधुर धुन
कुंजन वन विहँसा रे ।।
उड़े गुलाल अबीर अंगन
चौबारा रंग नहाए
बालवृंद पिचकारी ले
हैं गलियन धूम मचाए
साजन हैं परदेस
सजनियाँ ड्योढी बैठ निहारे ।।
**जिज्ञासा सिंह**
चित्र साभार गूगल