किसी के होंठ पे दिखती न मुझको वो खुशी है
जिसे चंद रोज़ पहले हमने तुमने की थी साझा
वो जा के दरमियाने सात परतों के छिपी है ।
झांककर देखती हूं,आज मैं धीरे से दर्पण
हैं फिर भी दिख रही सिकुड़न, जो माथे पे खिंची है
मेरे मन में वहम और शक की सुइयां चुभ रही हैं
करूं क्या डर के मारे, नींद मेरी उड़ चुकी है
वो कहते हैं करो विश्वास अपने आप पर तुम
मगर जुड़ती नहीं चटकी, जो टूटी सी कड़ी है
किसी आहट पे आंखें ढूँढती हैं कोई अपना
पर अनजानी सी दस्तक से ये दुनिया ही डरी है
**जिज्ञासा सिंह**