वहाँ अपनी धूप होगी अपनी ही छाँव
होगा वही अपना पुराना गाँव
लेटकर झुलेंगे झिलगी खटिया की वरदन में
पेड़ पर चढ़ेंगे खेलेंगे लच्छी डाड़ी
गुल्ली डंडा लंगड़ी और सिकड़ी
चुरा के तोड़ेंगे कच्ची अमियां गाँव भर की बगियन में
चलेंगे नदिया तलाव नहाने हम
गोता लगायेंगे झमाझम
छप्पक छैया खेलेंगे पोखरन में
सावन आएगा बरखा बरसेगी
दुआरे पिछवारे तलैया खूब भरेगी
नाव नवरिया खेलेंगे चाँदनी रतियन में
किताब बस्ता लेकर स्कूल चलेंगे हम सब
इमला गिनती पढ़ाएँगे मास्टर साहब
पहाड़ा उनको हम सुना देंगे सेकंडन में
खाएँगे अम्मा के हाथ की रोटी औ दाल ज़बरिया देंगी वो खूब ही मक्खन डाल
ज़्यादा खिला देंगी वो फँसा के बतियन में
**जिज्ञासा सिंह**
चित्र साभार गूगल
