कुछ तो वादा होगा मेरा खुद से ।
खुदगर्जी आच्छादित दर्पी बेखुद से ।।
ऐसे कहाँ बदलती है तल्खी औ तेवर ।
पहने अक्स निहारूँ आभाओं के जेवर ।।
डर ही जाती दिखते दर्पण के ही बुत से ।
ये कैसा है रूप मेरा मुझसे ही निर्मित ।
किन किन मणियों से है दिखता अहम सुशोभित ।
सीधी सरल कुछेक कई हैं अद्भुत से ।।
निरत सदा बहती जो धारा खुद के रस की ।
गर्म सर्द या तीखी, बहे नहीं मधुरस सी ।
यही सोच खटपट करती सुधबुध से ।।
जो पनपा वो बीज जटिल बोझिल कर्कश सा ।
करता वही विनाश, वही विपरीत है आशा ।
छोड़े न जो द्वार हृदय का, लड़े बुद्ध से ।।
मैं से आगे करेगा तू क्या मानव कुछ नव युग में ?
वर दे खुद को करे उजाला दिव्यज्योति का मग में ।
इस नव वर्ष "रहा ये वादा मेरा".. मुझसे ।।
**जिज्ञासा सिंह**