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अमृत है हर बूँद


बूँद एक टपकी गगन से ।
बूँद एक टपकी नयन से ।।
बूँद का हर रूप मानव, 
को परिष्कृत कर गया।।

बूँद गिरती जब सुमन पे ।
बूँद गिरती जब तपन पे ।।
बूँद का प्रारूप प्रकृति को,
सुसज्जित कर गया ।।

बूँद की भर के अँजूरी ।
बूँद हर पल है जरूरी ।।
बूँद का प्यासा समंदर,
खुद को गहरा कर गया ।।

बूँद है आकार जीवन ।
बूँद से साकार तन मन ।।
बूँद ही बनकर रुधिर हर,
धमनियों में बह गया ।।

बूँद की महिमा जो समझे ।
बूँद को प्रतिपल सहेजें ।।
बूँद को अमृत समझने,
वाला सागर बन गया ।

**जिज्ञासा सिंह**