तुमको लिख पाती साजन
तो रचि-रचि लिख जाती।
बिन मसि बिन लेखनी एक
मैं अद्भुत ग्रन्थ सजाती॥
साँझ ढले बैठती तीर मैं,
निज मन के अँघड़।
श्वाँसों की सौ आँख बचाकर,
तुमको लेती पढ़॥
रंग-बिरंगे डोरों पर लिख,
तिरते भाव सजाती॥
भोर भए तुम दूर क्षितिज पे
चढ़कर आते भूप।
लहरों के दर्पण में सजता
सुंदर-नवल स्वरूप॥
मैं बहती धारा में उतरी,
और उतर जाती॥
जब भी दिखता बिम्ब तुम्हारा,
मनका बन जाता।
धागा बनकर हृदय पिरोती,
जीवन मुस्काता॥
मन का मनका जपता तुमको,
मैं तो तर जाती॥
**जिज्ञासा सिंह**
