सत्र पर बस ध्यान दो


क्या हुआ क्या रह गया ?
कौन क्या-क्या कह गया ?
जितने मुँह उतनी कथन,
मत किसी पर कान दो ।
सत्र पर बस ध्यान दो ॥

जिंदगी का लघु या विस्तृत सत्र ये, 
पालता है शत्रु लाखों मित्र ये ।
क्षणिक क्षण में रूप बदले रंग भी,
पग पे पग है रख रहा सर्वत्र ये ॥
खुद ही प्रेरक,खुद ही बनता प्रेरणा,
बस इसे उत्थान दो ॥

बोया अपना काटना है, है नियम,
बूझकर अब हर उठाना है कदम ।
भार लेकर शीश पर चलना पड़ेगा,
वक्त करता है नहीं कोई रहम ॥
सोच को करना परिष्कृत है अभी,
रहने उसे गतिमान दो ॥

एक दिन और एक दिन बीते सदी,
रोक न पाया कोई बहती नदी ।
बह रही थी,बह रही अपनी ही लय में,
कीच कचरे से भरी छाती लदी ॥
धार पकड़ो उस नदी का बह चलो, 
मार्ग की पहचान दो ॥

**जिज्ञासा सिंह**

जिंदगी बन जाऊँगी

मात्र बस दो गज की दूरी
और जानें बच गईं,
एक गज बस एक गज
तुम दूर रहना
ज़िंदगी बन जाऊँगी ।

वक्त का वरदान तुमसे चाहिए, 
जिंदगी है वक्त मुझसे माँगती ।
एक तिनका आँख में जो चुभ रहा,
ढूँढना एकाग्र होकर चाहती ।।
क्या किया क्या कुछ मिला ये सोचना है ?
अंत में कुछ और क्या कर पाऊँगी ?
जिंदगी बन जाऊँगी ।।

आसमाँ में जो लगाते छेद हैं,
चरण अब उनका गहूँगी ।
बैठ जाऊँगी मैं मस्तक ये झुका के,
शरण गह, नव अंकुरण मैं अब करूँगी ।।
उग सकूँगी फल सकूँगी पेड़ बनकर,
पुष्प मैं डलिया में भर ले आऊँगी ।
जिदंगी बन जाऊँगी ।।

जब चलूँ तो तुम न मुझको टोकना।
दूर हैं मंजिल की राहें हैं कठिन ।
चुभ हैं सकते कंकणों के पर नुकीले,
पहुँचने के करने हैं लाखों जतन ।।
पंथ पथरीले घनेरी रात में भी,
चाँदनी बन मार्ग पर मैं छाऊँगी ।
जिंदगी बन जाऊँगी ।।

ये कोई मुख से न निकली बात है,
बात है ये युग युगों से चल रही ।
उर के तहखाने में बैठी रात दिन,
मोक्ष के विश्वास में पल पल रही ।।
अब उसे मुक्ति दिलानी है मुझे,
सुगमता का मार्ग हर दिखलाऊँगी ।।
जिंदगी बन जाऊँगी ।।

**जिज्ञासा सिंह** 
 चित्र साभार गूगल

अगर पायल मेरी बोले (गीत)

 

रुको  ! 

देखना मुझको,

स्वयं की छवि है पानी में 

ढूँढना है 

अभी अंतर

बहावों की रवानी में 


जो ठहरी सी हुई काई में,

एक मछली फँसी मचले 

फड़कते पंख हैं उसके

करे घर्षण आह निकले 

वही घर्षण चले दिन रात 

मेरी जिंदगानी में 


है पानी प्राण उसका 

और मेरी ये हवाएँ हैं,

मगर घटता सरोवर

देख कर हँसती फजाएँ हैं,

मछलियाँ डूबकर मरती,

रहीं मेरी कहानी में॥


खुले आकाश का पंक्षी,

उड़े स्वच्छंद पर खोले

ठिठक जाते कदम रह-रह

अगर पायल मेरी बोले

रहे बंधक मेरे घूँघरू

भरी चढ़ती जवानी में॥


 नींदों में सजा सपना,

 सपने में कोई रहबर 

जगा दे जो ऊनींदेपन से,

देखूँ नैन मैं भरकर 

है क्या अंतर समझ ,

जाए दासी और रानी में 


**जिज्ञासा सिंह** 


नयी नवेली जात

 

नयी नवेली जात  

सड़क पर घूम रही है ।

माथे जड़े बिसात

हवा संग झूम रही है ॥


चुप चुप छुपकर उसे देखना 

मुँह पर उँगली रखकर ।

नज़र कहीं  पड़ जाए

रहना उससे बचकर ॥

गज के जैसी चाल,

राह में दूम रही है 


कसा शिकंजा अगर

पड़ेगा सब पर भारी ।

करते बड़े शिकार 

स्वयं वे बड़े शिकारी ॥

फँसने और फँसाने की

अब चक्की घूम रही है 


मकड़े के जिस जाल

फँसी युग युग से चींटी ।

खड़ा सिपाही देख रहा

था, बजी  सींटी ॥

वही लिए संताप जात

अब बूम रही है 


**जिज्ञासा सिंह**


याद रहे ये भी माँ हैं (मातृ दिवस)

नेह की भूखी खड़ी थीं आज अम्मा ।
श्वेत वस्त्रों में जड़ी थीं आज अम्मा ॥

थीं सजाती माथ पे बिंदिया जहाँ ।
केसरी चंदन गढ़ी थीं आज अम्मा ॥

जल छिड़कतीं, बुदबुदाते होंठ उनके ।
मंत्र जीवन का पढ़ीं थीं आज अम्मा ॥

जो बहक जातीं थीं निर्मल भावना में ।
वक्त के हाथों कढ़ी थीं आज अम्मा ॥

कह हैं जाते भाव उनके चक्षु के ।
ख़ूब हालातों लड़ीं थीं आज अम्मा ॥

कुछ मिलेगा मूल्य उनके कर्म का ।
ताकती पल-पल घड़ी थीं आज अम्मा ॥

संग उनके हैं सखी अगणित खड़ी ।
जोड़ती अब भी कड़ी थीं आज अम्मा ॥

ज्यों कुरेदा मर्म उनके गर्भ का ।
बरस बन बदरी पड़ी थीं आज अम्मा ॥

**जिज्ञासा सिंह**

वे जीत लेते बाज़ी


वे पास में बिठाकर 
शतरंज खेलते हैं ।
एक दाँव खास उनका
चालों पे मेरे भारी,
वे जीत लेते बाज़ी
हम हार झेलते हैं ॥

है झूम झूम चलता, 
गज मस्त चाल अपनी ।
और अश्व दौड़ता है,
रह-रह फुला के नथुनी ।
स्तब्ध शान्त बैठी 
हर दाँव देखती हूँ,
नजरें मेरी बचाकर
वे शस्त्र भेदते हैं ।।

सौ अस्त्र शस्त्र मेरा, 
बस एक चाल उनकी ।
गज अश्व ऊँट पैदल,
सहमें हैं सुनके धमकी ।
हारे थके व अनमन
ले त्याग औ समर्पण,
मेरे अज़ीज़ प्यादे
घुटने ही टेकते हैं ॥

सिर पर मुकुट सजाए,
बाँधे विजय का सेहरा ।
मेरी सैन्य ताक़तों पे,
मुझपे लगा के पहरा ।
उनकी तनी हैं मूँछें
संसार की समूचे,
मेरी भी वसुधरा का 
हर द्वार घेरते हैं ॥

**जिज्ञासा सिंह**

उनकी राहें बड़ी कठिन है (मजदूर दिवस)

उनकी राहें बड़ी कठिन हैं ।
दूर गए परदेस सजाने मीठे सपने
चौराहे पे खड़े, 
आज मुख हुआ मलिन है ॥

पीठ पे गठरी भरी गृहस्थी
एक झोले में जीवन,
काम मिले या लौटें वापस
खड़े विचारें हैं मन,
अनथक चलता है ये राही
थकता न पल छिन है ॥

लाख फाइलें चलीं, तरक्की होगी 
होंगी मीनारें भी इनके नाम,
गारा तसला मुकुट सरीखा होगा
ऊंचे होंगे अब इनके भी दाम,
जोड़ तोड़ गठजोड़ बनेगा
आज काम का दिन है ॥

दस आँखें हैं दूर कहीं पर 
निशदिन साँझ अगोरें 
आहट की अकुलाहट में
हैं दिखते माथ सिकोरे
आस और विश्वास 
साधता वो अनगिन है ॥
उनकी राहें बड़ी कठिन है ॥

**जिज्ञासा सिंह**

रे जुलाहे बीन दे अब मेरी चादर


रे जुलाहे बीन दे 
अब मेरी चादर ।
ओढ़ लूँ ऊपर से नीचे
आबरू का तंतु भींचे
चल पड़ूँ सब ढाँपकर ।।

कुछ है लेना छूटना कुछ
जो मिला वो है बहुत कुछ,
भार सा सिर पर लदा है
कर निछावर दूँ सभी कुछ,
हूँ तनिक न अनमनी मैं
दूँ तुझे प्रासाद भरकर ।।

मैं सकल संसार खुद में
बीज बोती रोपती थी,
ग्रहण कर लूँ स्वयं में सब
लोभ माया पोहती थी,
अधिक पाया पर न जानूँ,
क्या मिला है अधिक पाकर ?

भाग्य से है तू मिला
यह सोच, लाई द्वार पे
तू ही कारीगर अनोखा
जो भी चाहे काढ़ दे 
जब चलूँ दुनियाँ निहारे
आज ऐसे रंग भर ।।

**जिज्ञासा सिंह**

जागृत देवता हैं पुस्तकें

तलाश जारी है,
जारी थी उनकी, जो अनिवार्यत है
जो निर्विकारी है ।

कूल मझाते भटकते
कदमों की दिशा भ्रमित हुई कई बार
एक अदना सा दृश्य नहीं दिखा
बोझ की गठरी बड़ी भारी है ॥

क्यों कर अंधा सा है मन 
जो दिखे वही खोजता, वही ढूँढता
बार बार करूँ प्रतिकार
धुजा से उतारने की तैयारी है ॥

एक डिबिया में बंद कर लूँ
या फैला दूँ यहाँ से वहाँ अंबर तक
सब कुछ परिलक्षित है
भाव से भरी उदारी है ॥

अपरिमित ध्रुवों को समेटे
विस्तार धारे अपने अंक में
क्या कुछ नहीं गर्भ में भरा
जगत आधारी है ॥

न जानों तो अंजान सी लगी
खाका छान लिया जग का
पलट कर उधेड़ा, बार बार देखा
वो नर है न नारी है ॥

विभूषित सुशोभित ब्रह्मऋषि की जटा जैसी घनी
सदियों से आभा बिखेरती
स्व में विश्व समेटे निमग्न अलंकृत, 
सर्व ज्ञान दायिनी पुस्तक हमारी है ॥

**जिज्ञासा सिंह**

पृथ्वी दिवस (पिरामिड)


हाँ
पृथ्वी
जननी
संरक्षिणी
सर्व दायिनी
है आधार श्वास
वायु जल प्रकाश ॥
**
हो
वृक्ष 
रोपण
कण कण
भू संरक्षण
प्रतिज्ञा समाज
पृथ्वी दिवस आज ।।

**जिज्ञासा सिंह**