इक्कीसवीं सदी और चौखट से बँधी नारी (महिला दिवस)


आज कुछ कहने को हैं, रुसवाईयां हमारी ।।

वे जब कहते हैं 
हम सुनते हैं 
सुन सुन के 
उनके बन के 
रहते भी हैं 
उनकी सहते भी हैं 
पर जाने क्यूँ 
हमें यूँ  
जीने नहीं देती हैं 
धोखा देती हैं,  
निश्चल परछाइयाँ हमारी ।।

जीवन जीते हैं  
कड़वे घूँट पीते हैं  
घुटती हुई साँसों 
बिखरे हुए अहसासों 
को जोड़ तोड़ के 
अपनी तरफ़ मोड़ के 
अपना बनाते हैं 
मन की अलमारी में सजाते हैं 
सजते ही 
कभी कभी 
बिखर जाती हैं पल भर में, 
वर्षों सहेजी, संजोयी ख़ुशियाँ हमारी ।।

क्या है ये ?
कैसा सिलसिला ये ?
नारी मन 
ये घर्षण 
सहते सहते 
बिछुड़ते रमते 
आस में जीते 
आँसुओं को पीते
बिता देता है सदियाँ 
पर बीतती नहीं वो घड़ियाँ 
छीन लेतीं जो क्षण भर में, दुनियाँ हमारी ।।

ये दुनिया भी क्या है ?
शायद एक धोखा है 
जो देते हम स्वयं को 
अपने परम को 
जिसे अपना बनाते हैं 
उसमें डूब जाते हैं 
दिखता नहीं अस्तित्व 
अपना ही व्यक्तित्व 
कर देते तार तार 
खो देते अधिकार 
ओढ़ते बिछाते गिनाते, 
समर्पण की मजबूरियाँ हमारी ।।

क्यों ? 
आखिर क्यों ?
नारी हैं हम !!
या इसी के अधिकारी हैं हम 
तुम तो कहते हो 
कहते ही रहते हो 
कि तुम्हीं से सबकुछ है 
क्या ये सच है ?
यदि हाँ 
तो हैं कहाँ 
तुम्हारी, केवल मेरे लिए,
तराशी, बनायी स्मृतियाँ हमारी ।। 

इतना मत बनाओ
मत सजाओ 
हमें गुड़ियों के जैसे 
सजे धजे तुम्हारी परछाईं से 
कब तक चिपकी रहूँगी 
अपनी कब सुनूँगी
कुछ कह रहा है आज हिय 
जरा सुनो मेरे प्रिय 
मन की बात 
मेरे ज़ज्बात
बहुत कुछ कहने को तुमसे, 
व्याकुल हैं अनुभूतियाँ हमारी ।।

काश कि तुम 
बनते हम कदम 
देते आत्मबल
बढ़ाते मनोबल 
मैं भी कदम से कदम मिलाती 
चलती जाती 
तुम्हारी परछाईयों से इतर
इधर उधर 
नहीं भटकती 
संभाल लेती
खुद को,  तुम्हारे न होने पर भी, 
संबल बनतीं निशानियाँ तुम्हारी ।।

**जिज्ञासा सिंह**
चित्र साभार गूगल 

कुछ महिलाएं - क्षणिकाएँ ( महिला दिवस )

 


कुछ महिलाएं
बहनें और माताएं
देतीं जीवन भर सेवाएं
सुघड़ गृहणी कहलाएं

कुछ पढ़ी लिखी नारी
करतीं दिन भर नौकरी
साथ में घर की चाकरी
कंधे से कंधा मिला कर रहीं बराबरी

गांव की कुछ मेहरारू
कमर पे लादे मुन्ना,मुन्नी,गौरी,झबरू
संभालती खेत खलिहान,घर द्वार,इज्जत आबरू
कहलातीं धीर गंभीर गरू

एक और जात है स्त्री 
बड़ी कलाकार,हुनरमंद मिस्त्री
अदाकार अभिनेत्री
घर में बनी ठनी सावित्री

दिखती है यहाँ वहाँ वो औरत
नानी, दादी, माँ जैसी सूरत
कैसी भी हो लगती बड़ी खूबसूरत
भावों भरी ममता की मूरत

अरे हां तुम भी तो हो वनिता
विदुषी, प्राज्ञी, पुनीता
देवी,दुर्गा,गौरा,सीता
धारण करती रामायण और गीता

सुंदर गंभीर रमणी
त्याग,दया,क्षमा,करुणा की जननी
नहीं चाहिए हीरे मोती और मणी
अपने में खुश जीवन मुल्यो की धनी

महान देश की महान सबलाएं
कही गईं अबलाएं
पर घर से रण तक अपनी प्रतिभा दिखलाएं
उनके आगे नतमस्तक हो, हम शीश नवाएं
 
सभी को महिला दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं
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**जिज्ञासा सिंह**

चिट्ठियाँ (माँ की धरोहर )

माँ के बक्से में रक्खी हुई चिट्ठियाँ
लाल कपड़े में लिपटी हुई चिट्ठियाँ

कौन, क्यूं, किसको, कब, क्या, हुआ है यहाँ 
नीली स्याही से रच रच लिखीं चिट्ठियाँ

पोस्टकार्ड भी है और लिफाफा भी है 
अंतर्देशी में सुख दुख भरी चिट्ठियाँ

आज मुन्नू गया, छुटकी कल जाएगी
सबका कॉलेज खुला कह रहीं चिट्ठियाँ

इसकी शादी हुई उसका गौना हुआ
रज्जो भाभी के बेटी हुई चिट्ठियाँ

कल थी मन्नो की शादी बड़ी धूम थी 
बड़ा सुन्दर है दूल्हा कहें चिट्ठियाँ

फूल मंडप सजा जयमाला हुआ
आए चालिस बराती सजे चिट्ठियाँ

खूब खाए सभी खूब गाए सभी
बैंड फ़ौजी ले आए नचें चिट्ठियाँ

चाचा रंगून हैं ताऊ दफ्तर गए
पापा आऐंगे, धीरज बने चिट्ठियाँ

दादी काशी गईं फिर अयोध्या गईं
तुमको पायल हैं लाईं बजें चिट्ठियाँ

जब से लौटी हैं तब से ही बीमार हैं
रात दिन याद करतीं तुम्हें चिट्ठियाँ

देखो रोना नहीं, तुम समझदार हो
माँ की सीखों से पूरी रचीं चिट्ठियाँ

दुनिया छोड़े हुए माँ को बीते बरस
हाय कैसे संभाली रखीं चिट्ठियाँ

इनमे शोखी भी है और श्रृंगार भी 
त्याग, संयम औ भावों भरी चिट्ठियाँ

मन है भावुक बहुत माँ तेरी याद में
अब तो जाती नहीं हैं कहीं चिट्ठियाँ

वरना लिखती मैं तुमको मनोवेदना
स्वर्ग में भेज देती कई चिट्ठियाँ

**जिज्ञासा सिंह**

सूखे तालाब की व्यथा (प्रदूषण)

गहरा अगाध,अपार हूँ मैं 
असीमित विस्तार हूँ मैं
पुराना, बूढ़ा तालाब 
अपने गाँव का पहरेदार हूँ मैं 

कोई घुस नहीं सकता यहाँ मेरे डर से 
मेरी विशाल भुजाओं व विस्तृत उदर से 
भय खाते हैं सभी मेरी मिसालों से 
अपने गाँव पे मर मिटने को तैयार हूँ मैं 

मेरे गर्भ में भरा अकूत खजाना रहा 
मेरे सीने पे लोगों का आना जाना रहा 
कईयों ने स्पर्धा जीती है मेरी छाती पर
उन खुशियों का हिस्सेदार हूँ मैं

डूबते का सहारा बना हूँ मैं
बूढे दरख्तों का थामता तना हूँ मैं
तिनका भी नहीं डूबा जहाँ
कश्ती कश्ती संभालता मझधार हूँ मैं

कई उद्योग पनपते रहे हैं मुझमे
जीव जंतु भी खेले मेरे आँगन में 
सीप घोंघों के घर गूंजी किलकारी यहाँ 
मछलियों और कछुओं का परिवार हूँ मैं 

ये बात कही जो वो तो मेरे कल की है
 बताते हुए दिल आज विह्वल भी है
लूटकर खत्म कर दिया मुझको जिसने 
लगा उनका कर्जदार हूँ मैं 

सूखता जा रहा हूँ मैं जब से
छूटते जा रहे हैं सब मुझसे
छिछला हो गया हूँ सिकुड़ सिकुड़ के अब
पहले जैसा न रहा रौबदार हूँ मैं 

सोचता हूँ सबको, फिर से बना लूँ अपना
काश कि मेरा पूरा हो जाए ये सपना
अब तो बस याद उनकी बाकी है
जिन्हें लगता था कि उनका संसार हूँ मैं 

**जिज्ञासा सिंह**

साँसों का साथ

एक गहरी साँस 
और उदास 
मन की बात 
पिघल गए हर हालात 
बह गए 
रह गए

कुछ अनछुए विस्मृत से पहलू 
मैं सम्भल लूँ 
उसे गले लगाऊँ 
अपना बनाऊँ 

और वो मेरा आंतरिक सौंदर्य
मेरा माधुर्य 
अपने में समेटती 
लपेटती 

गई धीरे धीरे 
और बोलती गई सखी रे 
मैं तुम्हारी हूँ 
केवल तुम्हारी ही हूँ 

अनगिनत साथी आए 
गए 
हम तुम साथ रहे 
घर्षण करते रहे 

आजीविका .
को जीविका 
बनाया मैंने
तुमने 

सहर्ष स्वीकारा 
धिक्कारा 
कभी नहीं 
लेती रहीं 

अपनी ऊर्जा 
ऊष्मा की पूजा 
कर ग्रहण 
अभिग्रहण 

कर उसे विस्तृत स्थान दिया 
मान किया 
और आज 
मैं तुम्हारी धमनियों की सरताज 

बन बैठ गई तुम्हारे भीतर 
ऊर्जावान हूँ गर्भ के अन्दर 
धीरे-धीरे बह रही हूँ 
रच रही हूँ 

तुम्हारी मनोरम कल्पना का दैदीप्य 
हो रहा है उदीप्य 
वही तो तुम्हारी शक्ति है 
कहीं कुछ और नहीं, इन्हीं साँसों के 
द्वार से बँधी सुन्दरतम मुक्ति है...

**जिज्ञासा सिंह**

हकीकतों ने पाला है


हमें हकीकतों ने पाला है 
हाँ ये सच है कि 
कि हमें हकीकतों ने पाला है 

हम पले घास के मैदानों में ।
ऊँची नीची टेढ़ी मेंढ़ी पगडंडियों ,
और गर्म रेगिस्तानों में ।।
कंकड़ पत्थरों पे चलते हुए, कई बार पड़ा पैरों में छाला है 
सच हमें हक़ीक़तों ने पाला है..

हम पले बरखा की फुहारों में ।
झीलों तालाबों नदियों किनारों ,
समुद्री तूफ़ानों और मँझधारों में  ।।
काग़ज़ की नाव बना हमने सागर मथ डाला है 
सच हमें हक़ीक़तों ने पाला है..

हम पले उतरनों को पहन के ।
बुआ चाचा दीदी भैया जो कपड़े पहनते , 
बिना शर्म पहन हम खड़े हो जाते बन ठन के ।।
घुटनों पे फटी पतलून हाथों से छुपा खुद को सम्भाला है 
सच हमें हकीकतों ने पाला है ..

किताबें भी माँगकर पढ़ लेते थे हम ।
पुरानी किताबों की ज़िल्दसाजी कर,
नयी बना देते थे एकदम ।।
बड़ी खुशी से कहते थे कि बस्ता भैया वाला है 
सच हमें हकीकतों ने पाला है ..

हमने सुनी हैं हज़ारों किस्से और कहानी ।
बाबा दादी नाना नानी के पहलू में चहक चिपक,
जिद कर कर के, उन्हीं की जुबानी ।।
अब तो रिश्तों पे लग गया ताला है 
सच हमें तो हकीकतों ने पाला है ..

**जिज्ञासा सिंह**

नींद की गद्दारी


आज फिर ज़िद पे अड़ गई 
मुझसे अकड़ गई 
मुई नींद 
छोड़ गई फिर उनींद
नहीं आना था तो नहीं आई 
मैं कितनी बार गिड़गिड़ाई
शांत मन से समझाया 
बुझाया, रिझाया 
फिर भी मुकर गई 
कर, ना नुकर गई 
ऐसी गई कि लौटी ही नहीं 
है यहीं कहीं 
मेरे आसपास 
मुझे है आभास 
पूछा क्यूँ नाराज है वो 
इतनी बदमिजाज़ है वो 
देने लगी ताने 
उलाहने 
उड़ा के मुझे यहाँ से वहाँ ले गई 
दुनिया टहला गई 
योग क्षेम करवा लिया 
तबला भी बजवा लिया 
राग बताती रही
बहाने बनाती रही 
अजीब अजीब 
बैठी रही बिल्कुल पुतलियों में,
छुपकर आँखों के करीब 
चिमचिमाती रही 
आती जाती रही 
कोई खटपट 
कोई आहट 
उससे न छूटी 
हर बात पे रूठी 
जैसे हूर की परी है वो 
इतनी नकचिढ़ी है वो 
कि मैं मना मना के गई हार !
दुःख दर्द में जब जरूरत हो तो
नींद दिखती सबसे बड़ी ग़द्दार !!

**जिज्ञासा सिंह**

क्षणिकाएं ( मान्या सिंह को समर्पित)

खून पसीना आँसू 
का एक धांसू 
मिश्रण हूँ मैं 
अपने को अर्पण हूँ मैं 

धोखा दर्द दुःख 
के सम्मुख 
दीवार हूँ मैं 
अपनी पतवार हूँ मैं 

दिल आत्मा मन 
के मिलन 
का ठिकाना हूँ मैं 
अपने आप में एक नजराना हूँ मैं 

बेबसी बेदर्दी बेकसी 
को दूर 
करने को मजबूर हूँ मैं 
अपनी आँखों का नूर हूँ मैं 

गरीबी भुखमरी लाचारी 
या बेरोजगारी 
से नहीं हारी हूँ मैं 
मन की राजकुमारी हूँ मैं 

तन मन धन 
का आकलन 
करती धुरी हूँ मैं 
अपने आप में संपूर्ण और पूरी हूँ मैं 

युग काल समय 
का विलय 
संजोती संरचना हूँ मैं 
सृष्टि की अद्भुत रचना हूँ मैं 

परिवार रिश्ते नाते 
को निभाते 
सब पे भारी हूँ मैं 
आत्मविश्वासी नारी हूँ मैं 

**जिज्ञासा सिंह**

नियति का क्रूर दंश ( हृदयाघात )



मुझपे बिजली गिरा गई नियति 

दे गई घाव और जला गई नियति 

 

चले भी कितना थे हम साथ उनके 

कदमों को हाशिए पे रुका गई नियति

 

अभी कल ही तो ख़ुशगवार मौसम था 

आई आँधी और सब कुछ उड़ा गई नियति

 

जो चमन उनके संग गुलाबों का लगाया था मैंने 

उन्हीं के काँटों में उलझा गई नियति 


ये सोचता कौन है कि कल क्या होगा 

 इन्हीं प्रश्नों में किस तरह उलझा गई नियति 


वो दो शब्द कह तो जाते मुझसे आख़िर में 

उन्हें सुनने को तरसा गई नियति 


ये उजाले ये रोशनी चुभ रही है मुझको 

घुप अंधेरों से दोस्ती करा गई नियति 


अब कहें तो किससे और क्या बोलें 

सब आंसुओं से बात करा गई नियति 


लोग कहते हैं कि भूल जाओ सब कुछ अब 

करूँ, क्या और कैसे ? भूलना ही भुला गई नियति 


समझ तो जाऊँगी उनकी बेबसी को एक दिन 

ज़िंदगी को फ़साना बना गई नियति

 

वो इस तरह बेरुख़ी कर नहीं सकते 

दिले नादान से धोखा दिला गई नियति 


**जिज्ञासा सिंह**

चित्र साभार गूगल 

ऋतुराज आए हैं

फिर उलझ गई 
पैरों से झाँझर खिसक गई 
क्या सुन्दर थी 
मन मुंदर थी 
बजती थी झनन झनन 
कानों में खनन खनन 
मधुर रस बरबस 
बिहँस बिहँस 
घोलती थी 
ऐसे बोलती थी 
कोयल भी चुप रह जाय 
सप्त सुर ही सुनाय 
चहुँ ओर दिशाओं में 
बासंती हवाओं में 
उसकी ही तान थी 
गीत और गान थी 
उसकी मधुर धुन 
पे झूमे भौंरे गुन गुन
चिड़ियों ने नृत्य किया 
महक उठी हर बगिया 
बगिया के रंग देख 
तितली के पंख देख 
अप्सरा उतर आईं 
लेकर के अंगड़ाई 
कलियों से बोलीं ये 
सजो आज वेणी में 
देखूँगी दर्पन मैं 
कजरारे नैनन में 
कौन रसिक 
कौन पथिक 
बसा चला जाता है 
ढूँढ मेरी लाता है 
झनन झनन झाँझर वो 
खनन खनन बजती जो 
पहन पहन झूमूँगी
ऋतुराज आये हैं, चरण आज चूमूँगी ..

**जिज्ञासा सिंह**