गुफाओं के समंदर में
डूबकर आज अन्दर मैं
धरा पर शीश ज्यों रक्खा
नींद का आ गया झोंका
बजे घड़ियाल घण्टे यूँ
मैं उनसे जा तनिक मिल लूँ
यही सोचूँ औ अलसाऊँ
मैं कुछ भी न समझ पाऊँ
तभी आंखें झपकती हैं
कई परियाँ सी दिखती हैं
गेरुवे वसन में लिपटी
गगन की ओर हैं चलतीं
न उनका ओर दिखता है
न उनका छोर दिखता है
वो पकड़े हाथ में वीणा
लगे जैसे कई मीरा
धरा से जा रही हैं नभ
कौन रोके इन्हें बढ़, अब
वो गाती हैं मधुर धुन में
मैं डूबी उनकी गुंजन में
नहीं कुछ दिख रहा मुझको
मैं संग में चल पड़ी अब तो
हैं राहें मखमली रेशम
चले हैं झूमते अब हम
मेरे हाथों में भी वीणा
मुझे देती हुई मीरा
है कहती कृष्ण की हो जा
न कोई मार्ग है दूजा
तू अब तक क्यों नहीं समझी
रही जंजाल में उलझी
ये माया मोह का जीवन
बसंतों से भरा यौवन
तुझे न रास आयेगा
तुम्हें एक दिन रुलाएगा
चली चल, मेरे पीछे तू
देख न, पीछे मुड़ के तू
और मैं चल पड़ी आगे
लगा हैं भाग्य अब जागे
निरंतर बढ़ती जाती मैं
ये जीवन प्रभु की थाती है
यही मैं सोचती जाऊँ
हरी गुन झूम के गाऊँ
मुदित मन, आत्मा, अरु, उर
नयन मेरे झरें झर झर
**जिज्ञासा सिंह**