फिर विश्व सभ्यता मौन हुई
वे रीछ और वानर युग के
दिखते आदिम मानव जैसे
वनचर भी उनसे डरे हुए
पीते अपनों का लहू ऐसे
वे मानुष हैं या नर पिशाच
मनु की पहचान ही गौण हुई
इनकी अपनी ही माँ बहनें
अबलाएँ बनकर डरी हुईं
घातक हथियारों के डर से
अपने ही घर में घिरी हुईं
जो कल तक जग का हिस्सा थीं
इस दुनिया में वो कौन हुईं
है काल कलुषता का छाया
इस सृष्टि की हर एक थाती पे
आतंकी डाका डाल रहे
चढ़कर के विश्व की छाती पे
सब मूल्य,संस्कृति और उन्नति की
हर गाथा अब हौन हुई ।
सब घुसे हुए हैं मांदों में
इस देश में और विदेशों में ।
जो अब तक बड़े मुखर थे वो
छुप गए सियार के भेषों में ।।
उनको कुछ न दिखता है अब
हर जुबाँ भस्म हो पौन हुई ।
फिर विश्व सभ्यता मौन हुई ।।
**जिज्ञासा सिंह**