घर के आगे बरामदे में
ख़ाली कुर्सी झूल रही है
हिलता उसको छोड़ गए जो
उनकी यादें भूल रही है ॥
कभी हाथ में लिए किताबें
बैठे इसपे दादा जी।
गाँव गए है, मुझसे करके,
फिर आने का वादा भी॥
छड़ी बग़ल में खड़ी हुई
चाट वक्त की धूल रही है ॥
झाँक रहीं आँखों का चश्मा
बार-बार खिसकाते हाथ।
हर जिज्ञासा-उत्सुकता को
सुलझाते समझाते बात॥
सोच-सोच कर उन यादों को
मेरी साँसें फूल रही हैं ॥
कितने प्यारे दिन थे मैं था
दादा जी की गोदी में।
डालूँ उँगली उनकी मोटी
हट्टी-कट्टी तोंदी में॥
डाँट, प्यार-झिड़की वाली
मुझे चुभा अब शूल रही है ॥
(२) दादा जी की आदत
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पान सुपारी ख़ाना मेरे
दादाजी की आदत है।
इस आदत से उनकी आती
घर में हरदम शामत है॥
दादी जी दिन भर चिल्लातीं
यहाँ-वहाँ मत थूको।
मसल-मसल कर तम्बाकू
को हवा में यूँ न फूँको॥
ना खाने वालों को होती
इससे दिक़्क़त है॥
सब कहते आदत ख़राब ये
सौ बीमारी होंगी !।
बन जाते हैं धूम्रपान से
लाख तरह के रोगी॥
कान पकड़ लो सभी ज़िंदगी
पर ये घातक है॥
कारण और निवारण सुन
दादाजी जब घबराए।
कान पकड़ कर बोले
कि ये ज़हर न कोई खाये॥
इसको खाने से मर जाती
सारी ताक़त है॥
अब दादा जी नित्य भोर में
सभी को ये समझाते।
धूम्रपान का हर प्राणी,
को हैं नुक़सान बताते॥
अच्छा ख़ाना, स्वस्थ शरीर
प्रभु की नेमत है॥
**जिज्ञासा सिंह**
