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एक मिनट की क़ीमत (माँ बेटे का संवाद )

बेटे के लिए, उसके जन्मदिन पर लिखी मेरी कविता -२४ नवम्बर २०१७

                                                      चित्र -साभार गूगल 
                 

बंद कमरे में घंटों गेम खेलने के बाद,

अचानक एक तेज़ अवाज़ आई ।

दरवाज़ा पीटते हुए माँ,

ग़ुस्से में ज़ोर से चिल्लाई ।।


मैं भी अपने को सच साबित करते हुए,

उतनी ही ज़ोर से चिल्लाया ।

क्यों चीख़ती हो माँ ? एक मिनट रुको,

बस अभी आया ।।


इतना सुनते ही माँ,

झिड़ककर बोली ग़ुस्से में ।

बेटा एक मिनट की क़ीमत समझो,

वरना कुछ भी नहीं बचेगा तुम्हारे हिस्से में ।।


ये गेम ये फ़ोन ये टीवी,

तुम्हारे साथी जब से बने हैं ।

हम सब तुम से दूर हो रहे और 

लगता है ये ही तुम्हारे अपने हैं ।।


एक एक मिनट कर तुमने,

सालों गँवा दिया है ।

इनके चक्कर में अपना सब कुछ

दाँव पर लगा दिया है ।।


आओ ! ज़रा एक मिनट की क़ीमत,

 समझाती हूँ तुम्हें मैं ।

जब छूटेगी ट्रेन तुम्हारी मिनट की देरी पर,

समझोगे तब मिनट की क़ीमत क्या है ?


पूँछो एक्सिडेंट पीड़ित के बहते,

ख़ून से एक मिनट की क़ीमत ।

धड़कता हुआ दिल थम जाता है,

मौत नहीं देती मोहलत ।।


लहरों पे मचलती हुई नाव,

एक मिनट में डूब जाती है रसातल में ।

कीचड़ में पैर रखोगे बिना सोचे समझे,

तो एक मिनट में फँस जाओगे गहरे दलदल में ।।


एक मिनट में पड़ा लकवा,

जीवन भर के लिए बना देता है अपाहिज ।

इसलिए कहती हूँ एक मिनट की,

क़ीमत भूलना नहीं हरगिज़ ।।


एक मिनट में ही तुमने,

जन्म लिया था इस ज़मीं पर ।

और आज ज़ाहिलों की तरह,

चिल्लाते हो हमीं पर ।।


बेटा ये एक मिनट ही तुम्हारे,

जीवन का आधार बनेगा एक दिन ।

कुछ नहीं बन पाओगे,

मिनट की क़ीमत किए बिन ।।


अतः कहती हूँ समय के साथ,

चलना सीख जाओ अब ।

पछताओगे उस दिन,

ये एक मिनट साथ छोड़ जाएगा जब ।।


समय और यौवन लौटता नहीं,

एक बार बीत जाने के बाद ।

वक़्त पर क़ीमत नहीं की जिसने इनकी,

कभी हो नहीं पाता वो आबाद ।।


 **जिज्ञासा**