आज फिर ज़िद पे अड़ गई
मुझसे अकड़ गई
मुई नींद
छोड़ गई फिर उनींद
नहीं आना था तो नहीं आई
मैं कितनी बार गिड़गिड़ाई
शांत मन से समझाया
बुझाया, रिझाया
फिर भी मुकर गई
कर, ना नुकर गई
ऐसी गई कि लौटी ही नहीं
है यहीं कहीं
मेरे आसपास
मुझे है आभास
पूछा क्यूँ नाराज है वो
इतनी बदमिजाज़ है वो
देने लगी ताने
उलाहने
उड़ा के मुझे यहाँ से वहाँ ले गई
दुनिया टहला गई
योग क्षेम करवा लिया
तबला भी बजवा लिया
राग बताती रही
बहाने बनाती रही
अजीब अजीब
बैठी रही बिल्कुल पुतलियों में,
छुपकर आँखों के करीब
चिमचिमाती रही
आती जाती रही
कोई खटपट
कोई आहट
उससे न छूटी
हर बात पे रूठी
जैसे हूर की परी है वो
इतनी नकचिढ़ी है वो
कि मैं मना मना के गई हार !
दुःख दर्द में जब जरूरत हो तो
नींद दिखती सबसे बड़ी ग़द्दार !!
**जिज्ञासा सिंह**