सेतुबंध बनने की अब तुम सोचो
नौका कैसे पार लगेगी
टूटा पुल है।
जाना है उस पार, नदी में बाढ़ भरी
घाटों का व्यापार
भरा दलदल है ॥
चप्पू कुंदन की कीलों से ठुककर गढ़ा हुआ
हत्थे पर चांदी का पत्तल चढ़ा हुआ
पकड़ बड़ी मजबूत किए बैठा नाविक
चहुँ ओर निहारे दरिया ही अभिशाप,
बढ़ रहा जल है ॥
पोर-पोर है भरा हुआ जैसे तारों से अंबर
बंद कर रहा छेद आज रांगे को भरकर
रांगा छेद, छेद रांगे को रंज पाएगा
छेद-छेद जब भरी हुई है गाद
कील में छल है ॥
गंध फैलती गई हुआ जल खारा कड़ुआ
भरा अश्रु आँखों में दिखता धुआँ धुआँ
ठूंठ बबूल समुख बैठा है हलधर देखो
ताक रहा अंबर की रेखा-रेखा
बदरी की हलचल है ॥
**जिज्ञासा सिंह**
