गौरैया
और मेरी गुड़िया
दोनों बचपन से
हैं एक जैसे
मैं कहती हूं कुछ, वे सुनते हैं कुछ
और करते हैं कुछ
दोनों को पिंजरा पसंद नहीं
दोनों समय की पाबंद नहीं
दोनों आसमान छूने को आतुर
अपने को समझती
दोनों चतुर
एसी की जाली में जन्मी गौरैया
उड़ान भरते ही गिर गई मेरी अंगनैया
गुड़िया ने उठाया दुलराया
माँ की तरह सीने से लगाया
जूते के डिब्बे में घर बनाया
जो खाती वो, वही खिलाया
बस क्या था
दोनों का हौसला था
चिड़िया रानी फुर्र फुर्र उड़ने लगी
गुड़िया भी संग संग दौड़ने लगी
एक पिंजड़ा मंगाया गया
गौरैया का घर सजाया गया
ऐसे
घर की नई दुल्हन हो जैसे
अब जीना एक दूसरे के साथ था
एक के बिन दूजा उदास था
दोस्ती परवान चढ़ी
एक दिन बदली उमड़ी घुमड़ी
चिड़िया ने रखी एक ख्वाहिश
गुड़िया से करी नन्हीं सी फरमाइश
थोड़ा बाहर निकालो न
बादल दिखाओ न
प्यारी सखी
मेरी अंखियाँ बहार देखने को हैं तरसी
अविश्वास
की नहीं थी कोई बात
गुड़िया ने पिंजड़ा खोला
खुला आसमान देख चिड़िया का दिल डोला
वो उड़ गई पंख फड़फड़ा के
गुड़िया रोई चिल्ला चिल्ला के
मैं रह गई हतप्रभ
नादान गुड़िया आज भी है स्तब्ध
चुपचाप ऊपर देखती है
और कहती है
मेरी चिड़िया उड़ी नहीं , उसे हवा उड़ा ले गई अपने साथ
वह रोती होगी माँ, जब उसे आती होगी मेरी याद ..
**जिज्ञासा सिंह**