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विधि की लिखी

छमाछम बाँधकर पैरों में पायल, विपत्ति आ है जाती । 
हमारे शीश चढ़कर गीत, कुछ यूँ गुनगुनाती ।।

कि ढूढूँ मार्ग मैं कि वो आ गई है कब किधर से,
वो दरम्याने खड़ी उस मार्ग की रेखा मिटा जाती ।।

वो आती तो बड़ी चुप, शांत और गंभीर सी दिखती,
मगर मीठी छुरी की नोंक हमको है चुभाती ।।

कभी वो ऐसे आती कि धमाका शहर में होता,
कि ज्वाला की लपट आँगन में मेरे आग बरसाती ।।

धड़ाधड़ उखड़ जाती जिंदगी की वो मिनारें,
है जिनकी नींव भी पाताल के नीचे रखी जाती ।।

अरे हम समझ पाते जिंदगी के खेल मतवाले,
धरा पर पाँव पड़ते ही सजग तंद्रा ये हो जाती ।।

ये सुंदर रेशमी नींदों को रखते बंद डिबिया में,
तौलकर स्वयं को चलते समझ की राह खुल जाती ।।

मगर मानव हूँ कैसे जान लूँ उसकी लिखी क्या है ?
वही होगा जो विधना की कलम की नोंक लिख जाती ।।

विपत्ति या मुसीबत कब किसे बतला के आई है,
अजब मेहमाँ है वो जो बिन बुलाए द्वार मुस्काती ।।

 **जिज्ञासा सिंह**