नील कंवल से नैना झिलमिल, बिन बतियाँ मुस्काने ।।
सुमधुर बिहँसन देख सभी, सम्मोहित हो हो जाएँ ।
खड़ी गुलाबो निरख रहीं, औ नैनों से बतियाएँ ।।
कानन कुंडल छबी अनोखी, मेहंदी हाथ रचाए ।
है मासूम कली सी खिलती, सबके मन बस जाए।।
चंचल मन की चंचल खुशियाँ, न जानें बेचारी ।
बाली उमर में काम करे वो, निर्धनता से हारी ।।
पढ़ने की है उमर, खेलने का उसका अधिकार ।
नहीं जानती है समाज वो, न जाने सरकार ।।
डलिया में भर फूल, सभी से करती है मनुहार।
उन पैसों से आज चलेगा, उसका घर परिवार ।।
कोई समझे विकट विवशता, उसके बालेपन की ।
नन्हीं सी ये स्वयं कली है, वाट लगी बचपन की ।।
बचपन में जब मिली न रोटी, शिक्षा क्या पाएगी ?
ये समाज की रीढ़ है, नीचे झुकती ही जाएगी ।।
ये पिछड़ी तो स्वयं पीढियाँ, घुटने पे रेगेंगी ।
बेटी अंबर खाक चढ़ेंगी, फुलवा ही बेचेंगी ।।
चलो सभी मिल जुलकर, ऐसे कदम बढ़ाएँ ।
फुलवा वाले हाथ, हवा में यान उड़ाएँ ।।
**जिज्ञासा सिंह**