काश गगन पर घर होता एक मेरा
मैं रहती और रहता कुनबा मेरा ।।
मेरे कुनबे में कुछ रंग बिरंगे पक्षी होते
बुलबुल गौरैया संग मोर मोरनी नचते
एक बनाती नीड़ चाँद तारों से छुपकर,
तोता मैना पपिहा करते वहीं बसेरा ।।
काश गगन .....
मै और मेरी नन्हीं चिड़ियाँ भोर में उठते
दूर गगन से धरती की आभा को तकते
कोमल मन की चिड़ियाँ भावुक सी हो जातीं,
आता याद उन्हें जब अपना रैन बसेरा ।।
काश गगन.....
मैं उनको समझाती ये जो अपना घर है
फैला हुआ अपार और विस्तृत अंबर है
इससे सुंदर नहीं कहीं कुछ प्यारी सखियों,
चंदा का ये देश और तारों का डेरा ।।
काश गगन.....
मीठे फलों की याद उन्हें भूले न भूले
पेड़ों और टहनियों के ऊपर वो झूले
भीनी भीनी महक धरा के वन उपवन की,
अंखियों में लातीं अँसुअन का रह रह फेरा ।।
काश गगन.....
समझाती मैं बहुत, बहुत दीं उनको खुशियाँ
भूली नहीं वो घर अपना, न अपनी दुनियां
एक दिन सब ने ठान लिया जाना है उनको,
छोड़ गईं वो मुझे है सूना जीवन मेरा ।।
काश गगन.....
बैठी आसमान के ऊपर, बिल्कुल पड़ी अकेली
अपने घर को चली गईं सखियाँ अलबेली
चाँद सितारों से कितनी मैं बात करूं अब,
मुझमें रंग भरे न कोई अब तो यहां चितेरा ।।
काश गगन.....
**जिज्ञासा सिंह**