सन्नाटे में घर है
पूरा शहर है
यूँ कहें पूरा देश है
बदला हुआ परिवेश है
रात में सन्नाटा चीरतीं हैं कुछ आवाजें
एंबुलेंसें
आती जाती गाड़ी
सायरन बजाती घड़ी घड़ी
पाँच मिनट बाद
पीछे से औरत के रोने की आवाज
आती है सुनाई
साथ में दो मासूम बच्चों की परछाई
दिखी
और ये कहती हुई चीखी
पापा लौट आओ
इस तरह हमे छोड़कर मत जाओ
कितनी बार कहा था,घर से मत निकलो
मास्क पहन लो
पर आपने हमारी न मानी
आपको हमसे दूर ले गई, आपकी नादानी
क्या मिला आपको ? यूँ रुला के
हमें ऐसी दशा में पहुँचा के
जहाँ न आप हो न आपकी परछाई है
एक अजीब सी खामोशी छाई है
उसी खामोशी के साए में हम बस जिंदा हैं
पापा हम आप से बहुत शर्मिंदा हैं
आपको बचा नही पाए
और आप से जो, कह भी नहीं पाए
वो भुगतना सब कुछ अब हमें यहाँ है
क्योंकि हम बच्चों की बात
आप बड़े लोग सुनते कहाँ हैं ?
**जिज्ञासा सिंह**