चित्र साभार गूगल
आज़ पहली बार आज़ाद हुई मैं
चली हूँ अपनी चाल जैसे ही
वो कहते हैं अब तो बर्बाद हुई मैं
उड़ रहे हैं पंख अब हवाओं में
परिंदों का परवाज़ हुई मैं
रोके कोई बेशक मुझे अब भी
रुकेगी न उड़ान मेरी यारों
साथ देंगे जमीं आसमाँ मेरा
जोड़ करके सजा लूँगी मैं टूटे तारों
देख लेना मुझे तुम आज़मा के
अब न टूटेंगे ख़्वाब मेरे फिर
कौन कहता है सज नहीं सकता
हीरे मोती का ताज मेरे सिर
बन भी जाए गर रहगुजर कोई
तो आसमां भी थाम लेंगे हम
मिला न साथ तो भी कोई बात नही
राह कांटों में भी अपनी निकाल लेंगे हम
यही वो बात है मुझमें जो
सबसे जुदा करती है मुझको
आसमां में भी एक सुराख
जो दिखा सकती है सबको
कभी अनजान थी मैं अपने और तुम्हारे से
अब परिचय की नहीं मोहताज मैं
रख दिया है कदम मैंने पहली सीढ़ी पे
देखना हो के रहूंगी अब से कामयाब मैं
**जिज्ञासा सिंह**