आया फागुन झूम के, पवन बही रसधार।
चूनर धूमिल ज्यों उड़ी, रंग गई रंग हजार॥
सुरभि आम के शीश पर, सजा रही है मौर।
गजमुक्तक सा है खिला, रंग सुनहरा बौर॥
जली होलिका धूम से, गाओ प्रियवर फाग।
ढोल-मज़ीरा संग में, सात सुरों का राग॥
होला-गादा भूनते, होली में होरियार।
पूजन कर के खा रहे, भागे सभी बुख़ार॥
सरसों का उबटन मला, मला रगड़कर तैल।
जला होलिका मध्य सब,तन-मन-धन का मैल॥
होली में घर आ गये, दूर बसे परिवार।
लाए हैं सबके लिए, प्रेम पगे उपहार॥
कोयल गाती गीत मधु, गाए फाग बसन्त।
आस देखती प्रेयसी, कब आयेंगे कंत॥
इंद्रधनुष के रंग में, रंगी धरा चहुँओर।
होली के उल्लास से, बचा न कोई छोर॥
गुझिया घर-घर बन रही, पापड़ औ नमकीन।
ठंढाई संग ले मज़ा, खाते सब शौक़ीन॥
रंग और उल्लास का, होली है त्योहार।
आपस में सद्भाव संग, देना सबको प्यार॥
**जिज्ञासा सिंह**
