बाँसुरी, बाँस की
बार बार बदलती है अपना रूप
हथौड़ियों की चोट सह,खोखला कर देती है स्वयं को
ढलती साँसों के अनुरूप
फिर जन्म लेती है एक मधुर तान
कानों में रस घोलते हुए
जीवन में भर देती है सुन्दर गान
अधरों से गुजरते हुए
बह जाता है झर कर अहम और क्रोध
बाँसुरी के धुन के संग
बाँस की बाँसुरी रूखी सूखी सी
दे देती है जीवन को मधुर रंग
**जिज्ञासा सिंह**
