मुझे डांटे जा रही हो बराबर
माँ ! जरा भाई को भी कुछ कहो
घूमता रहता है इधर
तुम्हें हर वक़्त शिकायत रहती है मुझसे
परेशान हो गई हूँ तुम्हारी रोज़ की हिदायत से
मेरा कद बढ़ रहा है जैसे जैसे
मुझ पर नजर रख रही हो वैसे वैसे
मैं क्या कोई वस्तु हूँ जो लुट जाऊँगी
सच कहती हूँ माँ, तुम्हें नीचा नहीं दिखाऊंगी
भरोसा तो रखो अपनी बेटी पर
टांग दो पुरानी रवायतों को उन्हीं की खूँटी पर
आखिर मेरा भी अस्तित्व है अपना कोई
तुम्हारे सामने मैं इन बातों पे कितनी बार रोई
फिर भी पड़ी रहती हो पीछे मेरे
क्यूँ बनाती हो हमारे लिए चक्रव्यूह जैसे घेरे
कभी सोचा है आपने और आपके समाज ने
आपकी दादी ने,नानी ने,आपकी माँ ने और आप ने
पुरुष तो पुरुष हैं पर आप लोग भी नहीं कम हैं
आप जैसी स्त्रियाँ अपनी ही बेटी की दुश्मन हैं
अब मुझे मेरे हाल पर छोड़ो , सम्भाल लूँगी स्वयं को
मेरा वादा है, नहीं तोड़ूँगी मैं तुम्हारी किसी कसम को
**जिज्ञासा सिंह**
चित्र साभार गूगल
