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जीवन है एक खेल


मन मेरे अलबेले साथी सुनता जा ।
जीवन है ये,गुणागणित तू गुनता जा ॥

ठहरे पानी में जो कंवल खिला 
कीचड़ ही निकला ।
डाला अंजन दिया हुआ आँखों में 
कंकड़ ही निकला ॥
देख जरा पुतली को उलट पुलट के
बीन बीन कर किरचें
कंकड़ की रखता जा ॥

चुभता काँटा पावों में 
हो जैसे आँखों में कंकड़ ।
चलना दिखना दोनो दूभर
लुढ़का जाए बेबस ही धड़ ॥
कटे पेड़ के तने अलग हो रहे हों जैसे
उखड़ी जड़ है 
झड़ी कोपलें चुनता जा ॥

अनायास तू अब मत समझा 
बजी दुंदुभी टूटे मेखड़ बैंड बजा ।
सात सुरों के साज बीन में बजें सभी
ताल में ताल भिड़ा हाथों से आज सजा ॥
चले मदारी चाल नाचते पले पलाए
नाच उन्हीं की ताल
नई धुन बुनता जा ॥

रेखाओं का तंत्र बूझता जाने कब से
बचा नहीं है भोग लगाना अब कुछ ।
जो कुछ है संज्ञान रखो उर भीतर
मोल तोल का पलड़ा जाने सारा कुछ ॥
दाग धुला और चला गया फिर से आएगा
जीवन है एक खेल 
मदारी बनता जा ॥

**जिज्ञासा सिंह**