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प्रगति और प्रकृति का संघर्ष

मनुजता और प्रकृति के मध्य एक संघर्ष जारी है

मनुज सौ दिन प्रकृति को छल के, चढ़ता शीश पर उसके,
प्रकृति ने चाल उसकी, एक क्षण में यूँ उतारी है ।

कि पर्वत ऋणखलाएँ टूट कर, गिरती हैं तृण बनके 
औ चट्टानों में दबकर सिसकतीं साँसें हमारी हैं ।।

घने वन के दरख़्तों ने हमें क्या कुछ है कम झेला ?
वो रोते रह गए, हमने चलायी उनपे आरी है ।

मनुज ही ऐसा प्राणी है, जो साँसों का करे सौदा,
तो मानव ही जगत में, श्वाँस का दिखता भिखारी है ।।

अनर्गल क्षत विक्षत करते धरा जो, स्वार्थ वश अपने,
उन्हीं के वंश पर चलती, प्रकृति की भी कुल्हारी है ।

चमन में डाल पर बैठा उजाड़े घोसला जो खुद,
धरा भी फिर कहाँ उनके लिए आँचल पसारी है ।।

चलो माना प्रगति की राह में आती हैं ये मुश्किल,
मगर जो ठान ले कोई तो बाधा उससे हारी है ।

बड़ी विपदा भी टल जाती, प्रकृति का नियम मानें गर,
मगर मानव कहां माने, वो लिप्सा का पुजारी है ।।

**जिज्ञासा सिंह**