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मेरी अभिन्न सखी ( नदी )


दो पल 
अविरल 
बहती हुई कल कल
अविचल, निश्चल
नदी के तट पर मैं अकेली
अलबेली
ढूंढती हूं
सुकूं
कंकड़ फेकती हूं
चक्षुओं को फाड़कर देखती हूं
फटता हुआ नदी का गर्भ
मेरा सन्दर्भ
दिखता है मुझे
इससे पहले मुझे कुछ और सूझे
मैं फटी हुई धारा के साथ
पार समुंदर सात
बह जाती हूं
बहता हुआ पाती हूं
उभयचरों का झुण्ड
गहरे कुण्ड
से निकल निकलमेरे साथ बह चले हैं
कुछ मेरी बाहों में चिपके,कुछ मिल रहे गले हैं
इनके लिए मैं अनोखी हूं
लगता है जैसे इन्हें पहले भी कहीं देखी हूं
सोचती हूं, इन्हीं के साथ रह जाऊं 
यहीं सागर की तलहटी में एक नई दुनिया बनाऊं
घोंघों के अन्दर छुप जाऊं
नीले बैंगनी पौधों से बतियाऊं
खेलूं रंगबिरंगी मछलियों के संग
इनके रंग
अपने लगा लूं
अपना रूप छुपा लूं
छुपाए रहूं तब तक  
जब तक
ये जलसागर
मेरी गागर 
में न समा जाय, जो मैने नदी के किनारे
इसी सहारे 
से रखी 
है, कि मेरी अभिन्न सखी
मुझ जैसे मनुष्यों के अपमानों को सहती
और निरंतर बहती
कंकड़ों पत्थरों, चट्टानों,
कटानों 
को झेलती
कराहती, ढकेलती
दूषित 
प्रदूषित
मार्गो से होती हुई 
अपने को धोती हुई
स्वच्छ जल लेकर आएगी 
और मेरी गागर ऊपर तक भर जाएगी..

**जिज्ञासा सिंह**