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वो बहक गए

वो बहक गए 
महक गए 
किसी और के आँगन में 
मेरे उपवन में 
जरूर चुभे होंगे 
गड़े होंगे 
कैक्टस या गुलाबी काँटे 
हमने छांटे 
भी नहीं थे उन कंटीली 
नुकीली 
झाड़ियों के पर 
जो चढ़ रहीं थीं बार बार छज्जों पर 
शायद 
हद
पार कर गईं वो 
छज्जे से होते हुए आँगन तक उतर गईं वो 
तभी तो गए उलझ 
अब सुलझ 
भी जाएंगे 
तो कैसे मिटायेगें 
उन चुभे हुए कांटों के दाग 
जो कलियों के अनुराग 
की वज़ह से 
जिस्म की सतह से 
चिपक कर हैं रह रहे 
और दर्द आँसू बन कर बह रहे 
बड़ा मुश्किल है इंसानी सब्र 
जरा सा बेसब्र 
होते ही 
मान खोते ही 
रास्ते खोज लेते हैं निमित्त 
बदल जाती है परिस्थिति 
और मार्ग दिखते हैं अवरुद्ध  
विरुद्ध 
दिखते हैं वही अपने 
जिनके टूटते हैं सजे सजाए सपने 
फिर जाने क्यूं ?
 इंसान तू 
ऐसे दुर्गम मार्गों पे चलता है 
और बार बार फिसलता है
गिरकर टूटता है
अपने को ही,अपने हाथों से लूटता है.....
  
**जिज्ञासा सिंह**