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नारी जो गरभधारी


नारी जो गरभधारी, चले चाल मतवारी,
लचक मचक देख हिरनी लजात है ।
रत्नारी कजरारी, शीश धरे घट भारी
लगे पिया की दुलारी,सबै देखि सकुचात है ।।

भरी बदरी सी गढ़ी,मेघ आगे पीछे मढ़ी 
मोती जैसे बूँद बूँद, गिरे झरे बरसात है ।
कोई अँचरा पसारो,गोरी धना को संभारो 
देखो सृष्टि की जननी डगर चली जात है ।।

कोई उदर निहारे,कोई डगर निहारे 
कोई देख हथेली, पूँछे हाल कुशलात है ।
कोई कहे लाडो आए, कोई कहे लाला आए 
सुन सुन गोरी आज मन मुस्कात है ।।

सुघड़ सहेज बिन चुन खाए मेवा मिश्री 
राम किशन छवि नैन समात है ।
कन्या जो घर आए, देवी दुर्गा रूप धरे,
ममता वात्सल्य बीच लुटी आज जात है ।। 

**जिज्ञासा सिंह**
चित्र साभार गूगल