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हँसे नववर्ष !


नवागत वर्ष,
हर्ष हो हर्ष ।
सजे कचनार ।
गगन गुलजार ।।

सघन वन सजे ।
शरद ऋतु रजे ।।
कटीली झाड़ ।
कुसुम की आँड़ ।।

छुपी जाए ।
वो शर्माए ।।
कहे ऋतुराज ।
चले हैं साज ।।

बसंती रंग ।
मैं हूँ बेरंग ।।
मिलूँ कैसे ?
समुख उनसे ।।

कहेगा वो ।
हंसेगा वो ।।
कटीली हूँ ।
नुकीली हूँ ।।

अरे ऐ मन ।
न कर अनमन ।।
मैं हूँ जैसी ।
मगर फिर भी  ।।

उसी की हूँ  ।
मैं देती हूँ ।।
सदा संबल ।
वो जाता खिल ।।

खड़ा मधुमास ।
जगाता आस ।।
करूँ स्वागत ।
वो है आगत ।।

कुसुम ले नव ।
बिहँसती भव ।।
भ्रमर के गीत ।
मधुर संगीत ।।

घुला जग में ।
मेरे रग में । ।
हँसे नव वर्ष ।
दिखे उत्कर्ष ।।

सभी खुश हों ।
जगत सुख हों ।।
यही विनती ।
मैं हूँ करती ।।

**जिज्ञासा सिंह**