तुम चलो, सारथी मैं हूँ
थोड़ा सा तो चलो, डगर पर कदम बढ़ाओ
उन कदमों से कदम मिलाते चलते जाओ
अपने कदमों का दो सच्चाई से साथ,सारथी मैं हूँ
तुम चलो...
करके घोर परिश्रम जो चलते हैं सबसे आगे
उनका पकड़ो हाथ बिना कुछ उनके मांगे,
भर जाएगी खाली मुट्ठी,कर लो ये विश्वास, सारथी मैं हूँ
तुम चलो...
वो रुक सकते हैं,पर तुम रुक मत जाना
मार्ग दिखे अवरुद्ध,मगर तुम मत घबराना
अंतर्मन में झाँक, दिखे जो मार्ग, वही सन्मार्ग, सारथी मैं हूँ
तुम चलो...
आगे जो कुछ भी है, है गंतव्य तुम्हारा
दिख जाएगा, एक दिशा हो,एक लक्ष्य हो प्यारा
सौग़ातों की होगी, फिर बरसात, सारथी मैं हूँ
तुम चलो...
क्यों घबराते हो? हूँ मैं जब साथ तुम्हारे
वही मनुज है,जो विपत्ति में कभी न हिम्मत हारे
दिव्य जलाए ज्योति, और फिर जग में करे प्रकाश, सारथी मैं हूँ
तुम चलो, सारथी मैं हूँ ।।
**जिज्ञासा सिंह**
