समय उड़ चला
हाथ हिला हिला
ले रहा विदा
अलविदा
जैसे ही कहा मैंने
मुस्कुरा दिया उसने
मुझको चिढ़ाता सा
अजब गजब मुँह बनाता सा
दिखता रहा वो
दूर से जाने, क्या क्या कहता रहा वो
पल भर में घुमा गया चक्र
वक्र
सी दिखी छवि
मेरी अवि
मुझे कर गई तटस्थ
चित्त शांत आश्वस्त
कलरव करते मेघ उड़े
उमड़े घुमड़े
कह गए मन्द मन्द
स्वच्छंद
मेरे सहगामी
विचरण के स्वामी
मैं तुम और समय
नहीं चलते असमय
अपनी गति से चले जा रहे
हवाओं को बहा रहे
अपने ही साथ
तुम रह गए अनाथ
हाथ मसलते रहे
कहते रहे
ठहरो मैं आ रहा हूँ
अपनी सुना रहा हूँ
न तुम सुना पाये न मैं रुका
झुका झुका सा मेघ थका थका
उसे न बूँद मिली जो बरसती
मेरी भी आँखें तरसती
रह गईं उसके लिए
जिसके आगोश में अब तक जिए
जो न रुका है न रुकेगा
न थका है न थकेगा
वह चलायमान था चलता रहेगा
न तुम्हारा था न मेरा है न किसी का बनेगा
**जिज्ञासा सिंह**
चित्र साभार गूगल