घट और घाट सभी कुछ निर्जन ।
झड़कर उजड़ चुके हैं कुंजन ।।
बड़ा बवंडर छाया भू पर,
सबसे छुपके नजर बचाएँ ।
प्यारे राजनीति में आएँ ।।
वो भूखा है, रहने दो,
बिन कपड़े के जीने दो ।
उसका बोझ उसी के द्वारा,
सिर पर उसको ढोने दो ।।
किसे जरूरत है कि उसके
वोट की कीमत उसे बताएँ ।
प्यारे राजनीति में आएँ ।।
घर, बिजली, पानी और सड़कें,
सजी रजिस्टर में बढ़ चढ़ के ।
देने वाला प्यार से देगा,
यहाँ नहीं मिलता कुछ लड़ के ।।
मिल जाए तो खाओ सब्जी
वरना रोटी चटनी खाएँ ।
प्यारे राजनीति में आएँ ।।
लाखों लाख योजना निशदिन,
बनती है अपनी खातिर ।
लालच का बाजार सजाए,
बैठ गए हैं सब शातिर ।।
थैला लेकर जो पहुँचेगा
उसकी लेते सभी बलाएँ ।
प्यारे राजनीति में आएँ ।।
दल बदलुओं की भीड़ लगी है,
मान मनौवल जारी है ।
कभी इधर हैं कभी उधर हैं,
कहते सबसे यारी है ।।
जाएँगे वो वहीं खुशी से
सपरिवार जो उन्हें बुलाएँ ।
प्यारे राजनीति में आएँ ।।
खादी की बाजार सजी औ,
राजनीति का मौसम है ।
लकदक कुर्ता पाजामा औ,
उस पर टोपी रेशम है ।।
नहीं पूँछ है दीन हीन की
दुखियारा क्यूँ रूप दिखाएँ ?
प्यारे राजनीति में आएँ ।।
कुर्सी, मेजें, सिंहासन बन,
जगह जगह हैं सजी हुई ।
गेंदे की माला से गर्दन,
ऊपर तक है भरी हुई ।।
बस में लदकर चले आ रहे
बूढ़े, बच्चे औ महिलाएँ ।
प्यारे राजनीति में आएँ ।।
**जिज्ञासा सिंह**