वह गीता पढ़तीं
रामायण पढ़तीं
मुझे सुनातीं
समझातीं
सुंदर प्रसंग
कृष्ण और राम के भिन्न भिन्न और अदभुत रंग
वह दुर्गा शप्तशती पढ़तीं
मां दुर्गा को जीवन में धारण करतीं
दया क्षमा करुणा की छाया लगतीं
कटुता कलुषता में जब वो घिरतीं
दुर्गा का अवतार धरतीं
और उठातीं
तीर धनुष
लगा देतीं अंकुश
हिल नही पाता कोई सहसा
जब उनका उठता फरसा
तलवार बरछी कृपाण भी चलातीं वो
हर किसी को धाराशायी कर जातीं वो
उस के इस रूप से
रौद्र रूप से
सहम जाते
अक्सर उन्हें ये कहता हुआ पाते
कि मां दुर्गा के नव अवतार
हमें देते हैं सारे अधिकार
सिखाते हैं अपनी सुरक्षा
दीक्षा
देकर
कहते हैं कि ऐसे जीवन का अधिग्रहण कर
ऐ स्त्री !
तू है अनंता, तू ही धरित्री
तेरे गर्भ में संसार का हर वो सृजन है
जिससे फलता फूलता जीवन है
जग की सारी ऋतुएं तेरे कोख की देन है
तुझसे ही सृष्टि की अमरता है,जगत का कुशलक्षेम है
तू अपने को कमतर मत समझ
कमर कस
तुझे हराना बड़ा कठिन होगा
करना उसे बड़ा जतन होगा
जो तेरे समक्ष आएगा
एक बार सोचेगा फिर टकराएगा
क्योंकि तेरी हथेली में ही वो शक्ति है
जिससे मानव सभ्यता की अप्रतिम मुक्ति है ।।
**जिज्ञासा सिंह**