कभी जब चाँद पर चलना तो धीरे से बुला लेना
चले आयेंगे हम छुपकर जहाँ की उन निगाहों से
जिन्होंने कल कहा था राह में काँटे बिछा देना
बहुत दिन हो गए पकड़ी नहीं रेशम सी वो उँगली
मेरी जुल्फों में धीरे से वही उँगली फिरा देना
तुम्हारी राह में राहें, तुम्हारी बाँह में बाहें
तुम अपने बाजुओं में भर मुझे झूला झुला देना
तुम्हारे साँस की गर्मी मुझे अब भी बचाती है
उसी गर्मी की लौ से प्रेम दीपक फिर जला देना
धुआँ हो या अगन हो, हो रही हैं शबनमी आँखें
उन्हीं अश्कों से तुम एक प्रेम की दरिया बहा देना
बड़ी मुश्किल से फिर तुम्हारा साथ पाया है
हूँ एक टुकड़ा मैं दिल का,ये समझ, दिल में छुपा लेना
धड़कते सीने में अब तक बड़े अरमान बाकी हैं
तमन्नाओं की दुनिया में मेरी महफ़िल सजा देना
यही वो चीज़ तुमको, है बनाती अलहदा सबसे
कि मैं बोलूँ नहीं फिर भी तुम्हें आता समझ लेना
**जिज्ञासा सिंह**
चित्र गूगल से साभार