ज्ञान का भंडार होतीं पुस्तकें
मन का हैं श्रृंगार होतीं पुस्तकें
रूढ़ियों और बंदिशों की गांठ को
खोलने का द्वार होतीं पुस्तकें
जब कभी भी मेघ बरसे चमककर
रेशमी फुहार होतीं पुस्तकें
इस धरा की सरसता को जो छले
कहने का हथियार होतीं पुस्तकें
संस्कृति और मूल्यों का ह्वास हो जब
डालती संस्कार होतीं पुस्तकें
अलख जब हम हैं जगाते जगत में
दे रही अधिकार होतीं पुस्तकें
कुछ कहीं मन में खटकता हो अगर
मौन का उद्गार होतीं पुस्तकें
तेल डाले कान में बैठा दिखे जब तंत्र ये
बन रही गुहार होतीं पुस्तकें
ब्रम्ह और ब्रह्माण्ड है इनमें भरा
ज्ञान का भंडार होतीं पुस्तकें
इस जहाँ की हर नियति ये जानतीं
यूँ कहें संसार होतीं पुस्तकें
वक्त ने इनमें भरी जब कलुषता
कर रही प्रतिकार होतीं पुस्तकें
देवों की पूजा, सदा ही वंदनी
भावों का इजहार होतीं पुस्तकें
**जिज्ञासा सिंह**