बन के सत्तासीन ।
चाहे जितना ज़ोर बजाओ
भैंसें कब सुनती हैं बीन ॥
चरवाहा मदमस्त घूमता
पूँछ पकड़ता माथ चूमता
गहरी नदिया में नहलाता
बैठ पीठ चहुँओर ढूँढता
हरी घास का नर्म मुलायम
विस्तृत एक कालीन ।।
पगुराना वो सीख गईं
दूध की नदियाँ सूख गईं
लिए कमंडल खड़े हुए हम
लेरुआ की मिट भूख गई
थैला बोतल बिके धकाधक
पड़रू दूध विहीन ।।
धरी खोखली हाँडी है
गोरखधंधा चाँदी है
हड्डी सत रोटी चुपड़ी
लक्ष्मण रेखा फाँदी है
मावा मिश्री घोट मिलाया
पर्व हुआ रंगीन ।।
भैंसें कब सुनती हैं बीन ।।
**जिज्ञासा सिंह**