नयी नवेली जात

 

नयी नवेली जात  

सड़क पर घूम रही है ।

माथे जड़े बिसात

हवा संग झूम रही है ॥


चुप चुप छुपकर उसे देखना 

मुँह पर उँगली रखकर ।

नज़र कहीं  पड़ जाए

रहना उससे बचकर ॥

गज के जैसी चाल,

राह में दूम रही है 


कसा शिकंजा अगर

पड़ेगा सब पर भारी ।

करते बड़े शिकार 

स्वयं वे बड़े शिकारी ॥

फँसने और फँसाने की

अब चक्की घूम रही है 


मकड़े के जिस जाल

फँसी युग युग से चींटी ।

खड़ा सिपाही देख रहा

था, बजी  सींटी ॥

वही लिए संताप जात

अब बूम रही है 


**जिज्ञासा सिंह**


2 टिप्‍पणियां:

  1. जिज्ञासा, अगर तुम्हारा इशारा हमारे देशभक्तों की तरफ़ और धर्म-मज़हब के ठेकेदारों की तरफ़ है तो फिर ऐसी गुस्ताख़ी करने की भारी कीमत चुकाने को तैयार रहना.

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  2. जी,आपका आदेश सर माथे पर ।
    सार्थक प्रतिक्रिया के लिए आपका हार्दिक आभार।

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