भाव के भूखे हुए हैं.. गीत


                                   भाव के भूखे हुए हैं

उठ रही दीवार के 

कानों से कह दो

उँगलियाँ होठों से

अब वे न उठाएँ

मृत्तिका होते हुए

रुधिराश्कों पे

चीर का एक सूत

ही अब फेर जाएँ

घाव दे लूटे हुए है॥


अंग हर प्रत्यंग हैं

इन बाजुओं की 

शक्ति में घुसपैठ

करती क्षीणता है

तीव्र कंटक की

चुभन का दर्द पीना 

अब समय की

धीरता गंभीरता है

पाँव के टूटे हुए हैं॥


नव नवल नव

पल्लवों के पात

अभिनव भाव से 

सविनय बुलाते

गेह रखते हैं खुले

जंजीर में जकड़े

हुए जो पाँव थिर-

थिर काँप जाते

बाड़ में रूँधे गए हैं॥


जिज्ञासा सिंह

17 टिप्‍पणियां:

  1. जंजीर में जकड़े

    हुए जो पाँव थिर-

    थिर काँप जाते

    बाड़ में रूँधे गए हैं॥

    बहुत सुंदर सृजन जिज्ञासा जी 🙏

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  2. अति सुंदर भावपूर्ण रचना जिज्ञासा जी।
    सस्नेह।
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    जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना मंगलवार १३ फरवरी २०२४ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

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    1. रचना की प्रशंसा और चयन के लिए हृदयतल से आभार और अभिनंदन है आपका प्रिय सखी श्वेता जी।

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  3. आज पहली बार
    गेय रचना दिखी
    आभार

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  4. ' रुधिराश्कों ' वाह क्या शब्द है, अत्यंत भाव पूर्ण रचना
    सादर

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  5. वाह! सखी जिज्ञासा ,बहुत खूब!

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  6. आपके वह ने दिन बना दिया आभार आदरणीय।

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  7. बहुत सुंदर सृजन !

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