टहनियाँ फूल से
भरने लगी हैं
बंजरों की झाड़ काटी
कंटकों की बाड़ छाँटी
मृत पड़ी माटी जगाईं
और कुछ ऐसे जगाईं
मरुधरा विकसित-हरित
खिलने लगी है॥
खुदी का खोदा कुआँ था
पल रहा जिसमें धुआँ था
नीर था संक्रमित दूषित
कमल-शतदल किया रोपित
हर तरफ़ कलियाँ खिलीं
हँसने लगी हैं॥
था जहाँ स्वामित्व रण का
स्वामिनों के अपहरण का
जाल का घेरा घनत्व
छाँट बोए निरत सत्व
राह की पगडंडियाँ
दिखने लगीं हैं॥
जिज्ञासा सिंह
सुन्दर गीत !
जवाब देंहटाएंखुदी का खोदा कुआँ था
जवाब देंहटाएंपल रहा जिसमें धुआँ था
नीर था संक्रमित दूषित
कमल-शतदल किया रोपित
हर तरफ़ कलियाँ खिलीं
हँसने लगी हैं॥
वाह!!!
सच है खुदी के खोदे कुएं की नकारात्मक ता में घिरे हैं...
सुंदर संदेश के साथ लाजवाब गीत ।
बहुत सुंदर सृजन
जवाब देंहटाएंSandar
जवाब देंहटाएंआपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में" सोमवार 21 अक्टूबर 2024 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद! !
जवाब देंहटाएंबहुत बहुत आभार आपका सखी!
हटाएंसुन्दर
जवाब देंहटाएंसुन्दर
जवाब देंहटाएंबहुत प्यारा गीत प्रिय जिज्ञासा। सरस और रंगो से सराबोर 👌👌👌👌😊
जवाब देंहटाएंबहुत प्यारा गीत प्रिय जिज्ञासा। सरस और रंगो से सराबोर 👌👌👌👌😊
जवाब देंहटाएंजवाब दें
प्यारा गीत
जवाब देंहटाएंअति उत्तम रचना
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