नींद की गद्दारी


आज फिर ज़िद पे अड़ गई 
मुझसे अकड़ गई 
मुई नींद 
छोड़ गई फिर उनींद
नहीं आना था तो नहीं आई 
मैं कितनी बार गिड़गिड़ाई
शांत मन से समझाया 
बुझाया, रिझाया 
फिर भी मुकर गई 
कर, ना नुकर गई 
ऐसी गई कि लौटी ही नहीं 
है यहीं कहीं 
मेरे आसपास 
मुझे है आभास 
पूछा क्यूँ नाराज है वो 
इतनी बदमिजाज़ है वो 
देने लगी ताने 
उलाहने 
उड़ा के मुझे यहाँ से वहाँ ले गई 
दुनिया टहला गई 
योग क्षेम करवा लिया 
तबला भी बजवा लिया 
राग बताती रही
बहाने बनाती रही 
अजीब अजीब 
बैठी रही बिल्कुल पुतलियों में,
छुपकर आँखों के करीब 
चिमचिमाती रही 
आती जाती रही 
कोई खटपट 
कोई आहट 
उससे न छूटी 
हर बात पे रूठी 
जैसे हूर की परी है वो 
इतनी नकचिढ़ी है वो 
कि मैं मना मना के गई हार !
दुःख दर्द में जब जरूरत हो तो
नींद दिखती सबसे बड़ी ग़द्दार !!

**जिज्ञासा सिंह**

18 टिप्‍पणियां:

  1. नींद की गद्दारी के माध्यम से आपने कई आयाम, चिंतन प्रस्तुत किए..बहुत खूब..

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  2. बहुत बहुत आभार आपका अर्पिता जी, आपकी प्रशंसनीय प्रतिक्रिया को नमन है..

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  3. इतनी नकचिढ़ी है वो
    कि मैं मना मना के गई हार !
    दुःख दर्द में जब जरूरत हो तो
    नींद दिखती सबसे बड़ी ग़द्दार !!
    सचमुच निन्दिया रानी के अन्दाज नखरीले हैं। सुन्दर सृजन।

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  4. आपकी सुन्दर प्रशंसा दिल को छू गई आपका हृदय से आभार एवं सादर नमन..

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  5. लाजवाब! नींद की अच्छी ख़बर ली है आपने।

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  6. बहुत बहुत आभार आपका वीरेन्द्र जी, सादर नमन..

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  7. ये नकचढ़ी चैन को भी साथ लिए घूमती है। बहुत सुंदर रचना।

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  8. कविता भी और उसका शिल्प भी, दोनों ही प्रशंसनीय ।

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    1. आपकी प्रशंसनीय प्रतिक्रिया को नमन है सादर नमन..

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  9. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति, जिज्ञासा दी।

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद ज्योति जी, आपकी प्रशंसनीय प्रतिक्रिया का आदर करती हूँ..

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  10. अत्यंत रोचक शब्द चित्र जिज्ञासा जी। बहुत प्यारी रचना लिखी आपने नटखट नींद पर एक शानदार काव्य चित्र लिखा है। शुभकामनाएं।

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  11. आपका हृदय से शुक्रिया एवं अभिनंदन प्रिय रेणु जी..सादर नमन..

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