हुआ ज़ोर का दमा


घर की मुंडेरी पे बैठी 
बीड़ी पीतीं अम्मा ।
खट-खट खट-खट खाँसें बापू 
हुआ ज़ोर का दमा ॥

अस्पताल है कई 
बरस से बना हुआ ।
अंग्रेजी डॉक्टर है 
बैठा तना हुआ ॥
गाँव गिराँव एक 
पाँव से दौड़ पड़ा है ।
बीमारी को दूर 
भगाने डटा खड़ा है ॥

गमछा बाँधे, घूँघट काढ़े 
भीड़ हो गई जमा ।

दीवारों में जड़े हुए हैं 
नंबर हेल्पलाइन ।
लंबरदार दुआरे बैठी 
अरखिन औ घसिटाइन ॥
सोंटा लिए टेकते आईं, 
दोनों बुढ़िया बेवा ।
मिले बुढ़ापा, विधवा पेंशन, 
खाएँ वे भी मेवा ॥

कोई पालनहार नहीं,
न कोई रहा कमा ॥

नैतिक पाठ पढ़ाने वाले 
बीड़ी भी दे जाते ।
निथरी खटिया लेटे बापू 
तनिक नहीं खिसियाते ॥
मक्खी भिनक रही 
थाली बच्चों के हाथ ।
मिला मिला के खाते 
भात चटनी साथ ॥
अहा ! निकलता स्वाद 
भोज मन रमा ॥

**जिज्ञासा सिंह**

25 टिप्‍पणियां:

  1. गावों में फैली अशिक्षा, ग़रीबी, और अज्ञानता को हुबहू बयान करती प्रभावशाली रचना, स्वच्छता के महत्व को जब तक बड़े ही नहीं जानेंगे तब बच्चे कैसे स्वस्थ रह सकते हैं

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    1. जी, दीदी आपके कथन से पूर्णतया सहमत हूं। गांवों में अभी भी हर क्षेत्र में बहुत ही ज्यादा जागरूकता की जरूरत है । आपका अवलोकन बिलकुल सटीक है।
      आपकी प्रतिक्रिया ने रचना को सार्थक कर दिया।
      आपको मेरा सादर अभिवादन।

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  2. यह बहुत अच्छी बात है जिज्ञासा जी कि आप विविध विषयों पर बहुरंगी कविताएं रच रही हैं। यह रचना-वैविध्य निश्चय ही आपकी काव्य-यात्रा में नित-नवीन मील के पत्थर लाता रहेगा। आपने अच्छी कविता रची है जो कविता तो है हीएवं जिसे साहित्य की रेखाचित्र विधा के अंतर्गत भी श्रेणीबद्ध किया जा सकता है।

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  3. रचना की सार्थकता को परिभाषित करती आपकी अमूल्य प्रशंसा के लिए आपका बहुत आभार और अभिनंदन जितेंद्र जी । ये रचना अनुभवों की ही देन है।

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  4. विपन्न लोगों का सजीव शब्दचित्र । सशक्त और चिन्तन परक सृजन । वैविध्यपूर्ण सृजन आपकी लेखनी अनूठी है ।

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    1. बहुत बहुत आभार मीना जी । आपको सार्थक प्रतिक्रिया का हार्दिक स्वागत है ।

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  5. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  6. बहुत मार्मिक शब्द चित्र प्रिय जिज्ञासा जी।लोक जीवन में बीड़ी पीकर जीवन में अनायास जानलेवा दमा को निमंत्रित करने वाले इस तरह के अम्मा-बाबा बहुत देखे हैं और आज भी इनकी संख्या कम नहीं।बहुतही सहजता से आपने एक मार्मिक विषय पर अपनी सुदक्ष लेखनी उठायी है,जिसकी अनूठी शैली आपके भीतर के अत्यंत सन्वेदनानशील मन की परिचायक है।हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं 🌺🌺♥️♥️

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    1. रचना के मर्म तक पहुंचती आपकी सुंदर प्रतिक्रिया के लिए आभार और अभिनंदन प्रिय सखी ।

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  7. गाँव के विषय में मैं नहीं जानती हूँ । लेकिन यह रचना पढ़ कर जैसे आंखों के सामने दृश्य उपस्थित हो गया हो । बहुत संवेदनशील लिखा है ।

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    1. रचना के मर्म तक पहुंचती आपकी प्रतिक्रिया के लिए आभार और अभिनंदन प्रिय दीदी।

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  8. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार(२८-०५-२०२२ ) को
    'सुलगी है प्रीत की अँगीठी'(चर्चा अंक-४४४४)
    पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    सादर

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  9. लोक जीवन पर हो रहे अदृश्य प्रहार
    वाकई गांव की संस्कृति को नष्ट तो कर ही रहें हैं, साथ ही साथ लोगों को भी अंधे कुएं में धकेल रहे है.
    आपका यह गीत केवल बीड़ी और बूढ़े पर केंद्रित नहीं इसका केंद्र तो समूचा गांव है,जिसके भीतर पनप रही विडम्बनाओं का चित्रण है.
    गांव और गांव में रहते हमारी बुजुर्ग पीढ़ी की मनोदशा,स्वाथ्य और रहनसहन पर प्रभावी पड़ताल करता गीत है.
    लोकशैली में रचे इस गीत में, लोकजीवन की महक हैं और भाषायी जादूगरी हैं
    कमाल का सृजन
    बधाई

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    1. रचना के मर्म तक पहुंच गहन अवलोकन करती सार्थक प्रतिक्रिया से सृजन सार्थक हो गया । आपको मेरा सादर नमन।

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  10. सादर नमस्कार ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (29-5-22) को क्या ईश्वर है?(चर्चा अंक-4445) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है,आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ायेगी।
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    कामिनी सिन्हा

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    1. चर्चा मंच में रचना को शामिल करने के लिए आपका हार्दिक आभार प्रिय कामिनी जी । मेरी हार्दिक शुभकामनाएं ।

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  11. बीड़ी पीना व दमा की बिमारी से ग्रस्त बुढ़ापा एवं ग्रामीण परिवेश में जागरूकता की कमी पर बहुत ही उत्कृष्ट शब्दचित्रण करती लाजवाब रचना
    वाह!!!

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  12. बहुत बहुत आभार आपका सुधा जी ।

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  13. बहुत सुंदर, बुरी आदतों पर प्रहार

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  14. बहुत बहुत आभार विनीता जी ।

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  15. वाह गाँव का जीवन दर्शाता सुन्दर शब्द चित्र

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  16. ग्रामीण संस्कृति के एक यथार्थ को उजागर करती मानभावनी रचना! बधाई जिज्ञासा जी

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